सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 693 · Raag Dhanaasree · Bhagat Naam Dev Ji

1जिनके भाई दुर्योधन जैसे पराक्रमी शूरवीर थे, वे कौरव भी अहंकार में आकर ‘मेरी-मेरी' करते थे।

2जिस दुर्योधन का साम्राज्य बारह योजन तक फैला हुआ था, उसकी मृतक देह को भी गिद्धों ने अपना भक्षण बनाया॥२॥

3महाबली लंकापति रावण की सारी लंका सोने की बनी हुई थी

4परन्तु उसके द्वार पर बंधे हुए हाथी भी उसके किसी काम नहीं आए और क्षण भर में ही उसकी सारी लंका पराई हो गई॥३॥

5दुर्वासा ऋषि से कपट करके यादवों ने यह फल प्राप्त किया कि उसके श्राप देने से उनके समूचे वंश का ही सर्वनाश हो गया।

6भगवान ने स्वयं ही अपने भक्त पर कृपा की है और नामदेव अब भगवान का ही गुणगान करता रहता है॥४॥१॥

7मैंने अपनी दसों इन्द्रियों को अपने नियन्त्रण में कर लिया है और मन में से मेरे पाँचों शत्रु काम, क्रोध, लालच, मोह एवं अहंकार का तो नामोनिशान ही मिट गया है।

8मैंने अपने शरीर के सरोवरों को नामामृत से भर लिया है एवं विष रूपी विषय-विकारों का दमन करके बाहर निकाल दिया है॥१॥

9अब मैं इन विकारों को वापिस नहीं आने दूँगा।

10अब मैं एकाग्रचित होकर अमृत वाणी का ही उच्चारण करता रहता हूँ और अपनी आत्मा को इसी कार्य में लगे रहने का उपदेश देता रहता हूँ॥१॥ रहाउ॥

11मैं निवेदन करके गुरु के चरणों में लग गया हूँ और नाम रूपी वज्र कुठार से मोह को नाश कर दिया है।

12मैं संसार की तरफ से विमुख होकर संतों का सेवक बन गया हूँ और भक्तों का भय अपने मन में रखने लग गया हूँ॥२॥

13इस संसार के बन्धनों से मैं तभी मुक्त होऊँगा यदि मैं माया के साथ संलग्न नहीं होऊँगा।

14माया तो उस शक्ति का नाम है, जो जीवों को गर्भ-योनि में भटकाती रहती है और इसका त्याग करके ही में भगवान के दर्शन प्राप्त कर सकता हूँ॥३॥

15जो व्यक्ति इस प्रकार अर्थात् माया का त्याग करके भक्ति करते है, उनका जन्म-मरण का सारा भय दूर हो जाता है।

16नामदेव जी का कथन है कि हे भाई ! भगवान को ढूंढने के लिए बाहर वनों में क्यों भटकते हो ? क्योंकि उपरोक्त विधि द्वारा वह तो हृदय-घर में ही प्राप्त हो जाता है। ॥४॥२॥

17मारवाड़ देश में जैसे जल प्यारा होता है और ऊँट को लता प्यारी लगती है।

18जैसे मृग को रात्रिकाल में ध्वनि मधुर लगती है, वैसे ही मेरे मन में मुझे राम बहुत प्यारा लगता है॥१॥

19हे मेरे राम ! तेरा नाम बहुत सुन्दर है, तेरा रूप सुन्दर है और तेरा रंग भी अति सुन्दर है॥१॥ रहाउ ॥

20जैसे धरती को बादल प्यारा लगता है, भैवरे को जैसे फूलों की महक प्यारी लगती है और

21कोयल जैसे आम अति प्रिय है, वैसे ही मेरे मन में मुझे राम अति प्रिय है॥२॥

22जैसे चकवी को सूर्य प्रिय होता है और हंस को मानसरोवर प्रिय होता है।

23जैसे युवती को अपना पति बहुत प्यारा है, वैसे ही मेरे मन को राम बड़ा प्रिय है॥ ३॥

24जैसे बालक का दूध से अत्याधिक प्रेम होता जैसे पपीहे को मुंह में स्वाति बूंद की धारा बहुत प्यारी होती है।

25जैसे मछली का जल से है, वैसे ही मेरे मन में राम से बहुत प्रेम है॥ ४॥

26तमाम साधक, सिद्ध एवं मुनिजन राम के दर्शन करने की अभिलाषा करते हैं परन्तु किसी विरले को ही उसके दर्शन प्राप्त होते हैं।

27हे राम ! जैसे तीन लोकों के जीवों को तेरा नाम बहुत प्यारा है, वैसे ही नामदेव के मन को बिट्टल भगवान बहुत प्यारा है॥ ५॥ ३॥

28सर्वप्रथम विष्णु जी की नाभि से कमल पैदा हुआ, फिर उस कमल में से ब्रह्मा जी पैदा हुए और

29फिर इस जगत के समस्त जीव ब्रह्मा जी से उत्पन्न हुए हैं।

30आदिपुरुष परमात्मा की पैदा की हुई सृष्टि माया में फँसकर जीवन रूपी नृत्य कर रही है॥१॥

31सर्वप्रथम आदिपुरुष परमात्मा प्रगट हुआ और

32फिर आदिपुरुष से प्रकृति पैदा हुई।

33यह सारी सृष्टि इस प्रकृति एवं उस आदिपुरुष दोनों के सम्मिलन से रची हुई है।

34यह जगत भगवान का एक सुन्दर उपवन है, जिसमें जीव यू नृत्य करते हैं जैसे कुएँ की रहटों में पानी नृत्य करता है॥१॥ रहाउ॥

35स्त्री एवं पुरुष नृत्य कर रहे हैं।

36इस जग में जीवों से नृत्य कराने वाला परमेश्वर के सिवाय अन्य कोई नहीं है।

37तर्क करने से

38भ्रम उत्पन्न होता है।

39प्रभु का वचन है कि इस जगत में एक मैं ही हूँ और एक मैं ही अन्य सब रूपों में विद्यमान हो रहा हूँ॥ २ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं