सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 690 · Raag Dhanaasree

1धनासरी छंत महला ४ घरु १

2ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

3अगर परमेश्वर अपनी कृपा करे तो ही उसके नाम का ध्यान किया जाता है।

4सतगुरु मिल जाए तो सहज-स्वभाव ही प्रेमपूर्वक भगवान का गुणगान होता है।

5यदि परमेश्वर को स्वयं भा जाए तो मनुष्य दिन-रात उसकी महिमा गा कर सदैव ही प्रसन्न रहता है।

6वह अपना अहंकार, अपने अहंत्व एवं माया के मोह को त्याग देता है और सहज ही नाम में समा जाता है।

7कर्ता-परमेश्वर स्वयं ही सबकुछ करता है, जब वह स्वयं देन प्रदान करता है तो ही मनुष्य नाम की देन प्राप्त करता है।

8गुरु साहिब का फुरमान है कि यदि भगवान अपनी कृपा करे तो ही उसके नाम का ध्यान किया जाता है।॥१॥

9हे भाई ! पूर्ण सतगुरु ने मेरे मन में प्रभु हेतु सच्चा प्रेम उत्पन्न कर दिया है।

10अब मैं दिन-रात उसका ही सिमरन करता रहता हूँ और वह मुझे कदापि नहीं भूलता।

11मैं उसे कदापि विस्मृत नहीं करता और प्रतिदिन उसका ही सिमरन करता रहता हूँ। जब मैं उसका नाम लेता हूँ तो जिंदा रहता हूँ।

12जब मैं अपने कानों से नाम श्रवण करता हूँ तो मेरा यह मन तृप्त हो जाता है। मैं गुरु के माध्यम से नामामृत ही पीता रहता हूँ।

13ईश्वर अपनी कृपा-दृष्टि करे तो मनुष्य को सतगुरु से मिला देता है और फिर गुरु की अनुकंपा से उसके मन में विवेक बृद्धि विचरन करती है।

14सतगुरु ने मेरे हृदय में सच्चा प्रेम लगा दिया है॥२॥

15यदि मनुष्य को अहोभाग्य से सत्संगति मिल जाए तो उसे हरि-रस ही प्राप्त होता है।

16वह दिन-रात परम-सत्य में ही अपना ध्यान लगाकर रखता है, जिसके फलस्वरूप वह हर समय सहज अवस्था में लीन हुआ रहता है।

17जब वह सहज अवस्था में समाया रहता है तो वह भगवान के मन को बड़ा अच्छा लगता है और सदैव निर्लिप्त एवं वैराग्यवान रहता है।

18राम नाम में लगन लगाने से लोक-परलोक एवं समूचे जगत में उसे शोभा प्राप्त हो जाती है।

19वह सुख एवं दुःख दोनों से ही मुक्त हो जाता है। फिर प्रभु जो कुछ भी करता है, वही उसे अच्छा लगता है।

20अहोभाग्य से मनुष्य को सत्संगति मिल जाए तो उसे सत्संगति में हरि-रस प्राप्त हो जाता है।॥३॥

21मृत्यु ने स्वेच्छाचारी मनुष्य को अपनी दृष्टि में रखा हुआ है और द्वैतभाव के कारण वह बहुत दुःखी होता है।

22वह माया के दुःख में ही फॅसकर 'हाय-हाय' करता रहता है।

23वह माया के दुःख में फँसा रहता है और अहंकार में फँसा हुआ क्रोधी बन गया है। उसका समूचा जीवन ‘मेरी-मेरी' करते ही व्यतीत हो जाता है।

24जो प्रभु उसे सबकुछ देता है, उसे स्मरण नहीं करता, अंतिम समय वह पछताता है।

25नाम के सिवाय अन्य कुछ भी प्राणी के साथ नहीं जाता। उसके पुत्र, स्त्री एवं धन-दौलत ने उसे ठग लिया है।

26गुरु साहिब का फुरमान है कि द्वैतभाव में फँसकर स्वेच्छाचारी प्राणी बहुत दुःखी होता है और मृत्यु उस पर अपनी दृष्टि रखती है॥४॥

27भगवान ने स्वयं ही अपनी कृपा करके उसे अपने साथ मिला लिया है, गुरुमुख ने दसम द्वार प्राप्त कर लिया है, वह प्रभु के मन को भा गया है और

28वह अपने दोनों हाथ जोड़कर सदैव ही उसके समक्ष खड़ा रहता है।

29उसका हुक्म मानकर उसने सुख प्राप्त किया है, जब प्रभु के मन को भा गया है तो वह उसके हुक्म में ही लीन हो गया।

30वह दिन-रात सर्वदा ही उस प्रभु का सिमरन करता रहता है और सहज ही नाम का ध्यान-मनन करता है।

31नाम के द्वारा ही उसे नाम रूपी बड़ाई प्राप्त होती है। प्रभु का नाम ही नानक के मन को भाया है।

32ईश्वर ने स्वयं ही अपनी कृपा से अपने साथ मिला लिया है और उसने प्रभु का महल दसम द्वार प्राप्त कर लिया है॥ ५ ॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं