गुरु ग्रंथ साहिब 68 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji
1मैं अपनी आत्मा एवं देहि समर्पित करता हूँ और अपनी अहंकार-भावना त्यागता हूँ और सतिगुरु के उपदेशानुसार आचरण करता हूँ।
2मैं सदैव अपने गुरु पर कुर्बान जाता हूँ, जो मेरी आत्मा को प्रभु के साथ मिलाते हैं।॥ ७ ॥
3ब्राह्मण वही है जिसे ब्रह्म का ज्ञान है और प्रभु की प्रीति के साथ रंगा हुआ है।
4पारब्रह्म-परमेश्वर समस्त प्राणियों के अतेि निकट उनके भीतर ही निवास करता है, किन्तु इस रहस्य को कोई विरला प्राणी गुरु के द्वारा ही जानता है।
5हे नानक ! हरि-नाम द्वारा प्राणियों को बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त होती है और गुरु के शब्द द्वारा वह स्वामी को पहचान लेता है ॥८ ॥५॥२२॥
6श्रीरागु महला ३ ॥
7सारी दुनिया सहज सुख की कामना करती है परन्तु गुरु के बिना सहज की प्राप्ति नहीं होती।
8पण्डित एवं ज्योतिर्षी वेद एवं शास्त्रों का अध्ययन कर करके थक गए हैं और धार्मिक वेष धारण करने वाले साधु भ्रमों में भूले हुए हैं।
9जिस पर भगवान स्वयं कृपा करता है, वहीं गुरु से मिलकर सहज सुख को प्राप्त करता है।॥१॥
10हे भाई ! गुरु के बिना सहज सुख प्राप्त नहीं हो सकता।
11भगवान का नाम जपने से ही सहज उत्पन्न होता है और फिर भगवान मिल जाता है ॥१॥ रहाउ ॥
12भगवान का गायन किया यश तभी स्वीकृत होता है, यदि वह सहज ही गाया जाए। सहज के बिना भगवान के गुणों की कथा करना व्यर्थ है।
13सहज से ही मनुष्य के हृदय में भक्ति उत्पन्न होती है। सहज से ही भगवान हेतु प्रेम एवं उसके मिलन हेतु वैराग्य उत्पन्न होता है।
14सहज से ही सुख एवं शांति मिलती है। सहज के बिना जीवन व्यर्थ है ॥२ ॥
15भगवान की महिमा सदैव सहज ही करनी चाहिए और सहज ही समाधि लगानी चाहिए।
16सहज ही भगवान की महिमा उच्चारण करनी चाहिए और सहज ही सुरति लगाकर भगवान की भक्ति करनी चाहिए।
17शब्द द्वारा भगवान मन में आकर बसता है और रसना हरि-रस का पान करती है ॥३॥
18सत्य की शरण में आने वाला प्राणी सहजावस्था में मृत्यु-भय से मुक्त हो जाता है।
19यदि प्राणी सच्ची जीवन मर्यादा की कमाई करे तो ईश्वर का नाम सहज ही उसके चित्त में टिक जाता है।
20वे प्राणी बड़े भाग्यशाली हैं, जिन्होंने ईश्वर को पा लिया है और सहज ही उस हरि के नाम में लीन रहते हैं ॥४ ॥
21माया में लिप्त प्राणी कभी सहज-ज्ञान को नहीं पा सकता, क्योंकि माया द्वैत-भाव को बढ़ाती है।
22मनमुख प्राणी चाहे धार्मिक संस्कार करते हैं परन्तु अहंभावना उनको जला देती है।
23वे कभी जन्म-मरण के चक्र से निवृत नहीं होते अपितु पुनः पुनः जन्म लेते और मृत्यु को प्राप्त होते हैं।॥५॥
24जब तक माया के तीनों गुणों-रजस्, तमस्, सत में प्राणी का चित्त लिप्त रहता है, वह सहज का अधिकारी नहीं हो पाता; उक्त तीनों गुण भ्रान्ति उत्पन्न करते हैं।
25ऐसे प्राणी को पढ़ने-लिखने एवं बोलने का क्या लाभ है, यदि वह जगत् के मूल (प्रभु) को ही विस्मृत किए रहता है।
26वास्तव में सहज सुख चौथे पद पर लभ्य होता है, जिसकी प्राप्ति केवल गुरमुख के दामन में ही होती है।॥६॥
27निर्गुण प्रभु का नाम एक अमूल्य भण्डार है। मनुष्य को इसका ज्ञान सहज अवस्था में ही होता है।
28भगवान की महिमा गुणवान जीव ही करते हैं। भगवान की महिमा करने वाला सच्ची शोभा वाला बन जाता है।
29प्रभु भूले हुए जीवों को भी सहज द्वारा अपने साथ मिला लेता है। यह मिलाप शब्द द्वारा होता है ॥७ ॥
30सहज ज्ञान के बिना सारा जगत् ज्ञानहीन है। मोह-माया की ममता बिल्कुल अंधेरा है।
31सहज ज्ञान द्वारा अपार सच्चे शब्द की सूझ हो जाती है
32पूर्ण गुरु करतार स्वयं ही क्षमा करके अपने साथ मिला लेता है। ॥८ ॥
33सहज ज्ञान द्वारा ही उस अदृश्य, निर्भय, निरंकार ज्योति प्रभु को जिज्ञासु प्राणी पहचानता है।
34समस्त प्राणियों का एकमात्र पालनहार दाता है। यह सबकी ज्योति को अपनी ज्योति के साथ मिलाने में समर्थ है।
35पूर्ण शब्द द्वारा तू उस परमात्मा का यशोगान कर जिसका कोई अन्त या सीमा नहीं अथवा सागर की भॉति अपरिमित है ॥९॥
36भगवान का नाम ही ज्ञानियों का धन है। वह सहज अवस्था में रहकर नाम का व्यापार करते हैं।
37वे दिन-रात हरि नाम रूपी लाभ प्राप्त करते हैं तथा उनके भण्डार नाम से भरे रहते हैं और कभी समाप्त नहीं होते।
38हे नानक ! यह नाम के भण्डार दाता प्रभु ने स्वयं उन्हें दिए हैं और इन भण्डारों में कोई कमी नहीं आती ॥१०॥६॥२३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं