सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 685 · Raag Dhanaasree · Guru Tegh Bahaadur Ji

1यह यौवन, धन एवं प्रभुता के नशे में दिन-रात दीवाना हुआ रहता है॥१॥

2जो सदैव ही दीनदयालु एवं दुखों का नाश करने वाला है, इसने उस भगवान के साथ अपना मन नहीं लगाया।

3हे नानक ! करोड़ों में किसी विरले मनुष्य ने ही गुरुमुख बनकर भगवान की पहचान की है॥२॥२॥

4धनासरी महला ९ ॥

5उस योगी को योग-साधना की युक्ति की सूझ नहीं है

6जिस के हृदय में लोभ, मोह एवं माया की ममता प्रबल रहती है॥ १॥ रहाउ॥

7जिसके स्वभाव में पराई निन्दा एवं प्रशंसा नहीं है, जिसके लिए सोना एवं लोहा एक समान है और

8जो खुशी एवं चिन्ता से तटस्थ रहता है, उसे ही वास्तविक योगी समझो।॥ १।

9यह चंचल मन दसों दिशाओं में भटकता रहता है, जिसने इसे स्थिर कर लिया है।

10हे नानक ! जो आदमी इस प्रकार का है, उसे ही माया के बन्धनों से मुक्त हुआ समझो॥२॥३॥

11धनासरी महला ९ ॥

12अब मैं क्या उपाय करूँ ?

13जिस विधि से मेरे मन का संशय दूर हो जाए और मैं भयानक संसार-सागर से पार हो जाऊँ॥१॥ रहाउ ॥

14अमूल्य मानव जन्म प्राप्त करके मैंने कोई शुभ-कर्म नहीं किया, इसलिए मैं बहुत डरता हूँ।

15यह चिन्ता मेरे मन में लगी रहती है कि मैंने अपने मन, वचन एवं कर्म से कभी भी भगवान का गुणगान नहीं किया॥१॥

16गुरु का उपदेश सुनकर मेरे मन में कुछ भी ज्ञान पैदा नहीं हुआ और मैं तो पशु की भांति अपना पेट भरता रहता हूँ।

17नानक का कथन है कि हे प्रभु ! तुम अपने विरद् को पहचानो, तब ही मैं पतित भवसागर में से पार हो सकता ॥२॥४॥९॥९॥१३॥५८॥४॥९३॥

18धनासरी महला १ घरु २ असटपदीआ

19ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

20गुरु नाम रूपी रत्नों से भरा हुआ सागर है।

21संत रूपी हंस इस में से अमृत रूपी रत्न चुगते हैं और वे गुरु रूपी सागर से दूर नहीं होते।

22संत रूपी हंस हरि रस रूपी चोगा चुगते हैं और वे प्रभु को अच्छे लगते हैं।

23हंस रूपी संत, सागर रूपी गुरु में से अपने प्राणपति परमेश्वर को पा लेते हैं।॥१॥

24बेचारा बगुला (पाखण्डी) छोटे तालाब में क्यों स्नान करता है ?

25वह तो छोटे तालाब के कीचड़ में ही डूबता है परन्तु उसकी (विकारों की) मैल दूर नहीं होती॥१॥रहाउ ॥

26विचारवान पुरुष बड़े ध्यानपूर्वक अपने पैर धरती पर रखते हैं और

27वे दुविधा को छोड़कर निरंकार के उपासक बन जाते है।

28वे मुक्ति पदार्थ को प्राप्त कर लेते हैं और हरि रस चखते रहते हैं।

29गुरु ने उन्हें भवसागर में डूबने से बचा लिया है और उनके जन्म-मरण के चक्र मिट गए हैं।॥२॥

30हंस रूपी संत, सागर रूपी गुरु को छोड़कर कहीं नहीं जाता और

31वह प्रेम-भक्ति करके सहज अवस्था में ही लीन रहता है।

32हंस रूपी संत, सागर रूपी गुरु में और सागर रूपी गुरु, हंस रूपी संत में मिलकर एक रूप हो जाते हैं।

33यह एक अकथनीय कथा है कि संत गुरु की वाणी द्वारा प्रभु के दरबार में आदर-सत्कार प्राप्त करता है॥ ३॥

34शून्य मण्डल में एक योगी अर्थात् प्रभु विराजमान है।

35वह न तो स्त्री है और न ही वह पुरुष है।कोई कैसे कहे कि वह कैसा है ?

36धरती, आकाश एवं पाताल-इन तीनों भवनों के जीव उस ज्योति में ध्यान लगाकर रखते हैं।

37देवते, मनुष्य एवं नाथ परम-सत्य परमेश्वर की शरण में रहते हैं।॥ ४ ॥

38परमेश्वर आनंद का स्रोत है, अनाथों का सहारा है और

39गुरुमुख जन सहज अवस्था में उसकी भक्ति एवं सिमरन करते रहते हैं।

40हे भय का नाश करने वाले प्रभु ! तू भक्तवत्सल है,

41तेरे चरण को अपने ह्रदय में बसा कर एवं अपने अहंत्व को मारकर ही तेरे भक्तजन तुझे मिले हैं।॥ ५॥

42मनुष्य अनेक यत्न करता है परन्तु मृत्यु उसे बहुत दुःख देती है।

43सभी जीव अपने माथे पर मृत्यु का लेख लिखवा कर पृथ्वी में आए हैं

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं