गुरु ग्रंथ साहिब 684 · Raag Dhanaasree · Guru Arjan Dev Ji
1जिसका मन भगवान के चरण-कमलों के प्रेम में लीन हो जाता है,
2उस मनुष्य को चिन्ता की अग्नि प्रभावित नहीं करती॥२॥
3वह संतों की सभा में सम्मिलित होकर संसार-सागर में से पार हो गया है।
4निर्भय प्रभु का नाम जपो; हरि के प्रेम में आसक्त रहो॥ ३॥
5जो व्यक्ति पराया-धन के लोभ दोष एवं अन्य पापों से मुक्त रहता है,
6भयंकर यम उसके निकट नहीं आता ॥ ४॥
7उसकी तृष्णाग्नि प्रभु ने खुद ही बुझा दी है।
8हे नानक ! वह प्रभु की शरण में आकर माया के बन्धनों से मुक्त हो गया है॥ ५ ॥ १॥ ५५ ॥
9धनासरी महला ५ ॥
10सत्य का भोजन खाने से मैं तृप्त हो गया हूँ।
11अपने मन, तन एवं जिह्मा से मैंने परमात्मा के नाम का ध्यान किया है।॥१॥
12भगवान के सिमरन में जीना ही वास्तव में सच्चा जीवन है।
13साधुओं की संगत में मिलकर उसका भजन करना ही वास्तविक जीवन है॥१॥रहाउ ॥
14जँहा मैंने अनेक प्रकार के वस्त्र पहने हैं
15वही मैंने प्रतिदिन ही जो भजन-कीर्तन एवं भगवान का गुणगान किया है।॥२॥
16यही मेरे लिए हाथी, रथ एवं घोड़े की सवारी करना है
17में भगवान से मिलन का मार्ग अपने हृदय में देखता हूँ ॥३॥
18मैंने अपने मन, तन, अन्तर में ईश्वर का ही ध्यान किया है।
19हे नानक ! दास ने सुखों का भण्डार परमेश्वर पा लिया है॥४॥२॥५६॥
20धनासरी महला ५ ॥
21गुरु के चरण जीव का उद्धार कर देते हैं,
22जिसने एक क्षण में ही प्राणी को संसार-सागर में से पार कर दिया है॥१॥ रहाउ॥
23कोई मनुष्य कर्मकाण्ड करने में ही मग्न हो गया है और कोई तीर्थों पर स्नान कर आया है परन्तु
24दास ने तो हरि-नाम का ध्यान-मनन किया है।॥१॥
25जगत का स्वामी परमेश्वर सब जीवों के बन्धन काटने वाला है।
26नानक तो उस अन्तर्यामी ईश्वर का सिमरन करता रहता है।॥२ ॥३ ॥५७ ॥
27धनासरी महला ५ ॥
28तुझसे किसी तरह भी प्रीति न टूटे हे परमात्मा ! तेरे दास का यही निर्मल आचरण है॥१॥ रहाउ ॥
29तू मुझे मेरी आत्मा, प्राणों, मन एवं धन से भी अत्याधिक प्यारा है।
30हे परमेश्वर ! एक तू ही अहंकार के मार्ग पर रोक लगाने वाला है॥१॥
31तेरे सुन्दर चरण कमलों से मेरा प्यार लग जाए
32नानक की तो यही प्रार्थना है ॥२ll४॥५८ ॥
33ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
34धनासरी महला ९ ॥
35हे मानव ! तू भगवान को ढूंढने के लिए क्यों वन में जाता है।
36वह तो सबमें निवास करने वाला है, जो हमेशा माया से निर्लिप्त रहता है, वह तो तेरे साथ ही रहता है।१। रहाउ ॥
37हे मानव ! जैसे फूल में सुगन्धि रहती है और जैसे देखने वाले का अपना प्रतिबिम्ब शीशे में रहता है,
38वैसे ही भगवान तेरे हृदय में निवास करता है; अंतः उसे अपने हृदय में खोजो।॥१॥
39गुरु का ज्ञान यह भेद बताता है कि शरीर से बाहर जगत में और शरीर के भीतर हृदय में एक परमात्मा का ही निवास समझो।
40हे नानक ! अपने आत्म-स्वरूप को पहचाने बिना मन से भ्रम की मैल दूर नहीं होती ॥२ ॥१॥
41धनासरी महला ९ ॥
42हे संतजनो ! यह जगत भ्रम में पड़कर भटका हुआ है।
43इसने राम-नाम का सिमरन छोड़ दिया है और यह माया के हाथों बिक चुका है॥१॥ रहाउ ॥
44यह जगत तो माता, पिता, भाई, पुत्र एवं पत्नी के मोह में फँस चुका है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं