सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 682 · Raag Dhanaasree

1धनासरी महला ५ ॥

2परमात्मा अपना विरद् याद रखता है और अपने दास को संकट काल की एक घड़ी भी देखने नहीं देता।

3वह अपना हाथ देकर अपने दास की रक्षा करता है और श्वास -श्वास उसका पालन-पोषण करता है॥१॥

4मेरा चित प्रभु से ही लगा रहता है।

5मेरा मित्र प्रभु धन्य है, वह तो आदि से अंत तक सदैव ही मेरा सहायक बना रहता है॥रहाउ ॥

6मालिक की आश्चर्यजनक लीला एवं बड़ाई को देख कर मेरे मन में हर्षोल्लास उत्पन्न हो गया है।

7हे नानक ! प्रभु ने मेरी पूरी लाज-प्रतिष्ठा रख ली है, इसलिए परमेश्वर का नाम-स्मरण करके आनंद प्राप्त करो ॥ २॥ १५॥४६॥

8धनासरी महला ५ ॥

9जिस आदमी को प्राणपति दाता भूल जाता है, उसे बदनसीब समझो।

10जिसका मन प्रभु चरणों के प्रेम में लग गया है, उसने अमृत का सरोवर प्राप्त कर लिया है॥१॥

11हे ईश्वर ! तेरा सेवक राम नाम के प्रेम में मग्न होकर अज्ञान की निद्रा में से जाग्रत हो गया है।

12मेरे शरीर में से सारा आलस्य दूर हो गया है तथा मेरा मन अपने प्रियतम के साथ लग गया है॥ रहाउ ॥

13मैं जहाँ कहीं भी देखता हूँ, उधर ही नारायण को माला के मोतियों के धागे की भांति समस्त शरीरों में निवास करता हुआ देखता हूँ।

14हरिनामामृत रूपी जल को पान करते ही नानक ने अन्य सभी अनुराग त्याग दिए हैं।॥ २ ॥ १६ ॥ ४७ ॥

15धनासरी महला ५ ॥

16दास के सभी काम सम्पूर्ण हो गए हैं।

17इस कलियुग के समय में महा विषैली माया के जाल में राम ने मेरी लाज-प्रतिष्ठा रख ली है॥१॥ रहाउ॥

18अपने स्वामी प्रभु का बार-बार सिमरन करने से यम मेरे निकट नहीं आता।

19दास ने भगवान का धाम पा लिया है और उसके लिए साधु की संगति ही मुक्ति एवं वैकुंठ है॥१॥

20भगवान के चरण कमल ही दास के लिए अक्षय धन की थैली है और करोड़ों सुखों का निवास है।

21हे नानक ! मैं दिन-रात गोविन्द की आराधना करता रहता हूँ और सदैव ही उस पर कुर्बान जाता हूँ॥२॥१७॥४८॥

22धनासरी महला ५ ॥

23मैं राम से एक यही दान माँगता हूँ कि

24मैं तुम्हारा नाम-सिमरन करता रहूँ, जिसके फलस्वरूप सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।॥ १॥ रहाउ॥

25तेरे चरण कमल मेरे हृदय में बस जाएँ और मैं संतजनों की संगति प्राप्त करूँ।

26मेरा मन चिंता की अग्नि में न जले और आठ प्रहर तेरे गुण गाता रहूँ ॥१॥

27मैं सुख-कल्याण की अवस्था में भगवान की भक्ति करता रहूँ और जीवन भर प्रभु का जाप करता रहूँ।

28हे नानक ! मेरा परमेश्वर से अटूट प्रेम-रंग लग गया है, अब पुनः जन्म-मरण के चक्र में नहीं पडूंगा॥२॥१८॥४६॥

29धनासरी महला ५ ॥

30मैं तो राम से ही सभी पदार्थ माँगता हूँ।

31किसी मनुष्य से माँगने से मेहनत के बाद चिंता ही मिलती है, किन्तु प्रभु के सिमरन से ही मोक्ष मिल जाता है।॥१॥ रहाउ॥

32ऋषियों-मुनियों ने स्मृतियों एवं पुराणों का ध्यानपूर्वक विश्लेषण किया है और वे वेदों का अध्ययन करके उच्च स्वर में पढ़कर दूसरों को सुनाते रहते हैं।

33कृपा के सागर भगवान की भक्ति करने से ही उस परम-सत्य को पाया जाता है और यह लोक एवं परलोक दोनों ही सुखद हो जाते हैं।॥१॥

34भगवान के सिमरन के सिवाय अन्य जितने भी आचार-व्यवहार हैं, वे सभी निष्फल हैं।

35हे नानक ! संत गुरुदेव को मिलने से चिन्ता मिट जाती है और जन्म-मरण का भय नाश हो जाता है।॥२॥१६॥५०॥

36धनासरी महला ५ ॥

37भगवान के नाम-सिमरन से सारी तृष्णा बुझ जाती है।

38गुरु की वाणी से मन में बड़ा संतोष उत्पन्न होता है और प्रभु के साथ पूर्ण ध्यान लग जाता है॥१॥ रहाउ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं