सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 67 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji

1नाम के अतिरिक्त सारा संसार दुखी है। माया मनमुखी प्राणियों को निगल गई है।

2शब्द द्वारा मनुष्य नाम-सिमरन करता है और शब्द द्वारा ही वह भगवान में समा जाता है ॥४॥

3माया में फँसकर सिद्ध पुरुष भी भटकते रहते हैं और भगवान के प्रेम में लीन करने वाली उनकी समाधि नहीं लगती।

4माया आकाश, पाताल, धरती तीनों लोकों में जीवों को अपने मोह में फँसा रही है। वह समस्त जीवों को अत्याधिक लिपटी हुई है।

5गुरु के बिना माया से मुक्ति प्राप्त नहीं होती और न ही दुविधापन व सांसारिक ममता दूर होते हैं। ॥५॥

6माया किसे कहते हैं? माया क्या कार्य करती है?

7दुःख व सुख के भीतर माया ने इस प्राणी को जकड़ा हुआ है और जिससे प्राणी अहंकार का कर्म करता है।

8शब्द के बिना भृम दूर नहीं होता और न ही अन्तर्मन से अहंकार दूर होता है ॥६॥

9प्रेम के बिना भगवान की भक्ति नहीं हो सकती और नाम के अतिरिक्त मनुष्य को प्रभु के दरबार में स्थान नहीं मिलता।

10जब अहंत्च को नाम द्वारा मार दिया जाता है तो माया का पैदा किया भ्रम दूर हो जाता है।

11गुरमुख सहज ही हरि-नाम के धन को प्राप्त कर लेता है ॥७॥

12गुरु के बिना शुभ गुणों का पता नहीं लगता तथा शुभ गुण ग्रहण किए बिना भगवान की भक्ति नहीं होती।

13जब भक्तवत्सल श्री हरि मन में आकर बसता है तो मनुष्य के भीतर सहज अवस्था उत्पन्न हो जाती है। फिर वह प्रभु स्वयं आकर मिल जाता है।

14हे नानक ! किस्मत से ही सतिगुरु की प्राप्ति होती है और गुरु के शब्द द्वारा ही भगवान की महिमा-स्तुति करनी चाहिए ॥८॥४॥२१॥

15श्रीरागु महला ३ ॥

16भगवान ने स्वयं ही माया-मोह की रचना की है। उसने स्वयं ही जीवों को माया के मोह में फंसा कर भुलाया हुआ है।

17मनमुख कर्म तो करते हैं परन्तु उन्हें इसकी सूझ नहीं होती। लेकिन वह अपना जीवन व्यर्थ ही गंवा देते हैं।

18गुरुवाणी इस संसार में ईश्वरीय प्रकाश है। प्रभु की दया से प्राणी के मन में यह वाणी आकर बसती है ॥१॥

19हे मेरे मन ! भगवान का नाम जपो, इससे ही सुख की उपलब्धि होती है।

20पूर्ण गुरु की महिमा करने से परमेश्वर सहज ही प्राणी को मिल जाता है ॥१॥ रहाउ॥

21ईश्वर के चरणों में चित्त लगाने से मनुष्य का माया का भ्रम एवं मृत्यु का भय नाश हो जाता है।

22जिज्ञासु प्राणी जब गुरु-कृपा से नाम की आराधना करता है तो ईश्वर स्वयं उसके हृदय में निवास करता है।

23मनुष्य सत्य प्रभु के आत्म स्वरूप रूपी महल के अन्दर लीन हो जाता है और यमदूत उसे कदापि नहीं निगल सकता ॥२॥

24निम्न जाति के नामदेव छींबे और कबीर जुलाहे ने पूर्ण गुरु की कृपा से मोक्ष प्राप्त किया था।

25वे गुरु-शब्द का ज्ञान पाकर ब्रह्मज्ञानी बने और उन्होंने जातिगत गौरव अथवा अहंत्व का पूर्ण त्याग कर दिया।

26देवते एवं मनुष्य उनकी पावन वाणी का गायन करते है। उनकी शोभा कोई भी मिटा नहीं सकता ॥३॥

27दैत्य हिरण्यकशिपु का पुत्र भक्त प्रहलाद कोई धर्म-कर्म नहीं करता था। वह मन को स्थिर करने वाली संयम, ध्यान एवं समाधि रूप विधियों बारे कुछ भी नहीं जानता था। वह माया के मोह को नहीं जानता था।

28सतिगुरु से मिलकर वह निर्मल हो गया था वह रात-दिन नाम का जाप करता था

29और एक नाम को ही जानता था तथा अन्य किसी दूसरे को नहीं जानता था ॥४॥

30छः शास्त्रों के उपदेशों को मानने वाले योगी, संन्यासी इत्यादि गुरु के बिना संदेह में भूले पड़े हैं।

31यदि वे सतिगुरु की सेवा का सौभाग्य प्राप्त करें तो वे मोक्ष एवं ईश्वर को खोजने में समर्थ होते हैं और पूज्य हरि को अपने चित्त में टिका लेते हैं।

32सच्ची गुरुवाणी से उनका मन जुड़ जाता है और उनका आवागमन (जन्म-मरण के चक्र से) मिट जाता है। ॥ ५॥

33गुरु के बिना भ्रम में भूले हुए पण्डित शास्त्र इत्यादि का अध्ययन करके वाद-विवाद करते हैं, किन्तु शब्द के बिना उन्हें मोक्ष प्राप्त नहीं होता,

34वे चौरासी लाख योनियों में भटकते फिरते हैं। जब ईश्वर की अनुकंपा होती है तो सतिगुरु से मिलन होता है

35और जब सतिगुरु के उपदेशानुसार नाम की आराधना करते हैं, तब वह गति प्राप्त करते हैं। ॥ ६॥

36यदि प्राणी का गुरु से मिलन हो जाए तो सत्संग के कारण वह हरि-नाम स्मरण कर पाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं