गुरु ग्रंथ साहिब 670 · Raag Dhanaasree · Guru Raam Daas Ji
1हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम सदैव ही सत्य है इसलिए सत्य-नाम का ही जाप करो।
2यदि निरंजन परमपुरुष परमात्मा का नित्य ही ध्यान-मनन किया जाए तो इहलोक एवं परलोक में मुख उज्ज्वल होता है, अर्थात् प्रशंसा प्राप्त होती है॥ रहाउ॥
3जहाँ भी भगवान का सिमरन हुआ है, वहाँ से सब दुःख-तकलीफें दूर हो गई हैं।भगवान का भजन-सिमरन तो अहोभाग्य से ही होता है।
4गुरु ने नानक को यह मति दी है कि परमात्मा का जाप करने से ही भवसागर से पार हुआ जाता है॥२॥६॥१२॥
5धनासरी महला ४ ॥
6हे मेरे स्वामी ! मैं तो तेरे दर्शन करके ही सुखी होता हूँ।
7मेरी वेदना तू ही जानता है, अन्य कोई क्या जान सकता है॥ रहाउ ॥
8हे मेरे स्वामी ! तू ही सच्चा मालिक है, सदैव सत्य है और जो कुछ तू करता है, वह सब सत्य है।
9हे स्वामी ! जब तेरे सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं, फिर झूठा किसे कहा जाए ? ॥ १॥
10सब में तू ही समाया हुआ है और सभी तुझे दिन-रात स्मरण करते रहते हैं।
11हे स्वामी ! सभी तुझ से ही दान माँगते हैं और एक तू ही सब को देता रहता है॥ २॥
12हे मेरे मालिक ! सभी जीव तेरे हुक्म में हैं और कोई भी तेरे हुक्म से बाहर नहीं है।
13सभी जीव तेरे हैं, तू सबका स्वामी है और सभी तुझ में ही विलीन हो जाते हैं।॥ ३॥
14हे मेरे प्यारे स्वामी ! तू सबकी आशा है और सभी जीव तेरा ध्यान-मनन करते रहते हैं।
15हे प्यारे ! जैसे तुझे अच्छा लगता है, वैसे ही तू मुझे रख।हे नानक के पातशाह ! तू सदैव सत्य है॥ ४॥ ७॥ १३॥
16धनासरी महला ५ घरु १ चउपदे
17ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
18हे निराकार परमात्मा ! तू जीवों का जन्म-मरण का चक्र काटने वाला, सब दुःख नाश करने वाला, सबका मालिक एवं भक्तवत्सल है।
19यदि कोई गुरु के सान्निध्य में रहकर तेरा नाम-स्मरण करे तो क्षण में उसके करोड़ों अपराध मिट जाते हैं।॥ १॥
20मेरा मन प्यारे राम से लग गया है।
21दीनदयाल प्रभु ने मुझ पर अपनी अपार कृपा की है, जिससे कामादिक शत्रु-काम, क्रोध, लालच, मोह तथा अहंकार मेरे नियंत्रण में कर दिए हैं॥ १॥ रहाउ॥
22हे परमात्मा ! तेरा निवास स्थान अति सुन्दर है, तेरा रूप भी बड़ा सुहावना है और तेरे भक्त तेरे दरबार में बहुत सुन्दर लगते हैं।
23हे सर्व जीवों के दाता-स्वामी ! अपनी कृपा करके मुझे (भवसागर में डूबने से) बचा लो॥ २॥
24हे परमेश्वर ! तेरा कोई रंग दिखाई नहीं देता, तेरा कोई रूप समझा नहीं जाता।तेरी कुदरत की कौन विचार कर सकता है ?
25हे अगम्य रूप गिरिधारी ! तू जल, धरती एवं आकाश में सर्वव्यापी है
26तेरे सब भक्तजन तेरी स्तुति करते हैं। हे मुरारि ! तू अविनाशी परमपुरुष है।
27हे मेरे स्वामी ! जैसे तुझे उपयुक्त लगता है, वैसे ही मेरी रक्षा करो क्योंकि नानक ने तो तेरे ही द्वार की शरण ली है॥ ४॥ १॥
28धनासरी महला ५ ॥
29जल के बिना मछली ने अपने प्राण त्याग दिये हैं, क्योंकि उसने जल के साथ अत्याधिक मोह-लगाव बढ़ाया हुआ था।
30कमल-फूल के मोह में भैवरा नाश हो गया है, चूंकि उसे फूल में से बाहर निकलने का मार्ग नहीं मिला।॥१॥
31अब मेरे मन ने एक परमेश्वर से ही अपना मोह-प्यार लगाया हुआ है,
32वह न तो कभी मरता है, न ही जन्म लेता है, वह तो सदैव मेरे साथ ही रहता है। सतगुरु के शब्द द्वारा मैंने उसे समझ लिया है॥१॥ रहाउ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं