सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 66 · Siree Raag

1श्रीरागु महला ३ ॥

2जीव रूपी पक्षी, शरीर रूपी सुन्दर वृक्ष पर विराजमान होकर गुरु जी की इच्छानुसार सत्य नाम रूपी दाना चुगता है।

3वह हरि रस का पान करता है, और परम आनंद में रहता है और वह वहाँ न ही उड़ता, आता या जाता है।

4वह अपने आत्म स्वरूप के अन्दर आवास हासिल कर लेता है और हरि-नाम में लीन हो जाता है।॥१॥

5हे मेरे मन ! तू गुरु की सेवा करके उनके उपदेशानुसार पालन कर।

6यदि तुम गुरु की इच्छानुसार चलोगे, तब तुम रात-दिन ईश्वर के नाम में लीन रहोगे ॥१॥ रहाउ॥

7कई शरीर रूपी वृक्ष अत्यन्त सुन्दर हैं परन्तु जीव रूपी पक्षी उन पर टिक कर नहीं बैठते। वह माया रूपी दाना चुगने के लिए उड़कर चारों दिशाओं में जाते रहते हैं।

8जितना अधिक वह (ऊपर) उड़ते हैं, उतना अधिक कष्ट सहन करते हैं। वे सदैव दुखों-संतापों में ग्रस्त रहकर जलते एवं विलाप करते हैं।

9गुरु के अतिरिक्त उनको परमेश्वर का महल दिखाई नहीं देता, न ही वह अमृत फल को प्राप्त करते हैं। ॥२॥

10ब्रह्म का रूप गुरुमुख सदैव हरे-भरे वृक्ष जैसा है। उसको स्वाभाविक ही सत्य परमेश्वर की प्रीत की कृपा प्राप्त होती है।

11वह तीनों शाखाओं (सत्, रज और तम्) को काट कर ऊँचा उठता है और एक शब्द के साथ प्रेम लगाता है।

12केवल ईश्वर का नाम हीअमृतमयी फल है। वह स्वयं ही कृपा करके इसका सेवन करने के लिए देता है॥३॥

13मनमुख ऐसे वृक्ष हैं, जो खड़े-खड़े सूख जाते हैं। उनमें कोई फल और छाया नहीं।

14इन अज्ञानी प्राणियों की संगति नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उनका कोई भी घर और गांव नहीं होता।

15वे सदैव काटे और जलाए जाते हैं। उनके पास न तो गुरु का उपदेश और न ही हरि का नाम है ॥४॥

16मनुष्य ईश्वर के आदेश अनुसार कर्म करते हैं और अपने पूर्व-जन्म के कर्मों के अनुकूल भटकते फिरते हैं।

17ईश्वर के आदेशानुसार गुरमुख उसके दर्शन करते हैं और जहाँ वह उनको भेजता है, वहाँ वह जाते हैं।

18अपने आदेश द्वारा ईश्वर गुरमुखों के चित में टिकता है और उसके आदेश द्वारा ही वह सत्य में लीन हो जाते हैं ॥५॥

19मूर्ख, दुरात्मा ईश्वर की इच्छा को नहीं समझते और भ्रम में पड़े जन्म-मरण के चक्र में पड़कर भटकते फिरते हैं।

20मन के हठ अनुसार वह कर्म करते हैं और नित्य ही कलंकित होते हैं।

21उनके अंदर सुख-शांति नहीं आती और वे सत्य-स्वरूप हरि के साथ प्रेम नहीं कर पाते ॥६॥

22जो गुरु के साथ प्रीति एवं स्नेह करते हैं। उन गुरमुखों के मुख सुन्दर हो जाते हैं।

23वे सत्य की भक्ति में लीन रहते हैं और सत्य के साथ रंगे रहते हैं और परमेश्वर के द्वार पर वे सत्यवादी रूप में सम्मानित होते हैं

24उन मनुष्यों का ही जगत् में आगमन स्वीकृत होता है, और अपनी समस्त कुल का भी उद्धार कर देते हैं। ॥७ ॥

25प्रत्येक प्राणी ईश्वर की दृष्टि अधीन कर्म करता है। कोई भी प्राणी उसकी दृष्टि से ओझल नहीं।

26परमात्मा जिस पर जैसी कृपा-दृष्टि करता है, मनुष्य वैसा ही हो जाता है।

27हे नानक ! मनुष्य को नाम द्वारा ही यश मिलता है और नाम की उपलब्धि भगवान की मेहर से होती है ॥८ ॥३ ॥२०॥

28श्रीरागु महला ३ ॥

29गुरमुख भगवान के नाम का ध्यान करते हैं किन्तु मनमुख को भगवान के ध्यान की सूझ नहीं होती।

30गुरमुख का मुख हमेशा उज्ज्वल रहता है और भगवान उसके हृदय में निवास करता है।

31उसे सहज ही सुख की उपलब्धि होती है। वह सहज ही नाम में मग्न रहता है। ॥१॥

32हे भाई ! तू परमात्मा के अनुचरों का अनुचर बन जा।

33गुरु की सेवा से ही गुरु की भक्ति है किन्तु इसकी उपलब्धि कोई विरला ही प्राप्त करता है ॥१॥ रहाउ॥

34जो भाग्यशाली नारी सतिगुरु की इच्छानुसार आचरण करती है, वह सदैव सौभाग्यवती होती है।

35वह अमर व अचल स्वामी को प्राप्त हो जाती है। न वह मरता है और न ही जाता है।

36वह शब्द द्वारा प्रभु से मिलाप करती है, इसलिए उसे वियोग नहीं होता। अपितु अपने स्वामी की गोद में लीन हो जाती है। ॥ २॥

37हरि पवित्र व अत्यंत उज्ज्वल है। गुरु के बिना वह प्राप्त नहीं होता।

38धर्म-ग्रंथों के अध्ययन द्वारा मनुष्य को उसका बोध नहीं होता। आडम्बर करने वाले भ्रम-भुलैया में पड़े भटके हुए हैं।

39भगवान तो सदैव ही गुरु की मति द्वारा प्राप्त हुआ है। गुरमुख की रसना में हरि रस समाया रहता है ॥३॥

40गुरु के उपदेश द्वारा मनुष्य माया के मोह को नष्ट कर देता है। वह सहज अवस्था प्राप्त करके भगवान के प्रेम में मग्न रहता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं