सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 669 · Raag Dhanaasree · Guru Raam Daas Ji

1भगवान का गुणगान करो; इस ढंग से उसे पा लो, गुरु की सेवा करके इस तरह हरि-नाम का ध्यान-मनन करते रहो।

2इस तरह हरि के दरबार में अच्छे लगोगे, फिर तुम दुबारा जन्म-मरण के चक्र में नही आओगे और उस परम-सत्य की ज्योति में ही विलीन हो जाओगे॥ १॥

3हे मेरे मन ! हरि-नाम का जाप कर, फिर तू सर्वत्र सुखी रहेगा।

4हरि का यश सभी धर्म-कर्मों से उत्तम एवं उनसे श्रेष्ठ है और हरि की सेवा तुझे यम से मुक्त करवा देगी॥ रहाउ॥

5जब कृपानिधि हरि ने मुझ पर कृपा की और गुरु ने मुझे हरि-भक्ति की देन प्रदान की तो हरि से मेरी प्रीति बन गई।

6हे नानक ! मैंने अपनी सारी चिंता भुला कर अपने हृदय में हरि-नाम धारण कर लिया है और अब हरि मेरा मित्र बन गया है॥ २॥ २ ॥ ८ ॥

7धनासरी महला ४ ॥

8हरिनाम पढो,'हरि'हरि' लिखो, हरि का जाप करो और हरि का ही गुणगान करो, क्योंकि एक वही भवसागर से पार करवाने वाला है।

9अपने मन-वचन, हृदय में उसका ध्यान-मनन करो, प्रभु संतुष्ट हो जाता है, इसलिए इस तरह नाम ही जपते रहो॥ १॥

10मन में परमात्मा का जाप करते रहना चाहिए

11हे मेरे मित्र ! यह साधु महापुरुषों की संगत में मिलकर करना चाहिए।

12उस बनवारी प्रभु का कीर्ति-गान करो, उससे सदैव दिन-रात आनंद बना रहता है॥ रहाउ॥

13जब भगवान ने मुझ पर अपनी करुणादृष्टि की तो मेरे मन में उल्लास उत्पन्न हो गया। हरि-नाम का जाप करने से मेरी मुक्ति हो गई।

14हे मेरे स्वामी हरि ! नानक की लाज रखो, मैं तो तुम्हारी शरण में आ गया हूँ॥ २॥ ३॥ ६॥

15धनासरी महला ४ ॥

16हे परमेश्वर ! चौरासी सिद्ध, बुद्ध, तेतीस करोड़ देवते एवं मुनिजन सभी तेरे नाम की कामना करते हैं,

17परन्तु इनमें से कोई विरला ही गुरु की कृपा से नाम की देन प्राप्त करता है, जिसके माथे पर प्रारम्भ से ही प्रभु-प्रेम का लेख लिखा होता है॥ १॥

18हे मेरे मन ! राम नाम का जाप कर, चूंकि हरि का यशोगान सर्वोत्तम कार्य है।

19हे मेरे स्वामी ! जो तेरा यश गाते एवं सुनते हैं, मैं उन पर सदैव ही बलिहारी जाता हूँ॥ रहाउ॥

20हे मेरे स्वामी हरि ! तू अपनी शरण में आए जीवों का पालन-पोषण करने वाला है।जो तुम मुझे देते हो, मैं वही प्राप्त करता हूँ।

21हे दीनदयालु ! अपनी कृपा करके नानक को अपने नाम की देन दीजिए, क्योंकि उसे तो हरि-सिमरन का ही अत्यंत चाव है॥२॥४॥१०॥

22धनासरी महला ४ ॥

23सभी सिक्ख-सेवक पूजा करने के लिए गुरु की संगति में आते हैं और वे सभी-मिलकर हरि की उत्तम वाणी ही गाते हैं।

24परन्तु वाणी द्वारा गाया एवं सुना हुआ यश प्रभु केवल उनका ही परवान करता है, जिन्होंने सतगुरु की आज्ञा को पूर्ण सत्य समझकर स्वीकार कर लिया है॥१॥

25हे भाई ! हरि का कीर्ति-गान करो, चूंकि भवसागर में से पार करवाने हेतु हरि ही पावन तीर्थ स्थल है।

26हे संतजनों ! हरि के दरबार पर उनकी बात को उत्तम माना जाता है, जिन्होंने हरि-कथा की महिमा को समझा है॥ रहाउ ॥

27वह हरि-प्रभु स्वयं ही गुरु है और स्वयं ही चेला है और स्वयं ही अदभुत कौतुक करने वाला है।

28हे नानक ! हरि को वही मनुष्य मिलता है, जिसे वह स्वयं ही अपने साथ मिलाता है और वही उसको भाता है, जो प्रभु-सिमरन के सिवाय अन्य सबकुछ त्याग देता है॥२ ॥५॥११ll

29धनासरी महला ४ ॥

30जिस परमात्मा के वश में कामधेनु है, वह अपने भक्तों की हर इच्छाएँ पूरी करने वाला है और सर्व सुख प्रदान करने वाला है।

31हे मेरी आत्मा ! सो ऐसे प्रभु का ध्यान-मनन करना चाहिए, तो ही तुझे सर्व सुख प्राप्त होगा॥१॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं