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गुरु ग्रंथ साहिब 666 · Raag Dhanaasree · Guru Amar Daas Ji

1हे नानक ! वह स्वयं सबको देखता रहता है और स्वयं ही मनुष्य को सत्य-नाम में लगाता है॥४॥७॥

2धनासरी महला ३ ॥

3परमात्मा के नाम का मूल्य एवं विस्तार व्यक्त नहीं किया जा सकता।

4वे भक्तजन बड़े खुशनसीब हैं, जिन्होंने एक नाम में अपनी सुरति लगाई है।

5गुरु की मति सत्य है और उसका ज्ञान भी सत्य है।

6मनुष्य को ज्ञान प्रदान करके वह स्वयं ही उसे क्षमा कर देता है॥१॥

7हरि-नाम एक अदभुत अनहद ध्वनि है और प्रभु स्वयं ही जीवों को यह नाम सुनाता है।

8कलियुग के समय में कोई गुरुमुख ही यह नाम प्राप्त करता है॥१॥ रहाउ॥

9हम (जीव) मूर्ख हैं और मूर्खता ही हमारे मन मे विद्यमान है।

10हम सभी कार्य अहंकार में ही करते हैं लेकिन

11गुरु की कृपा से ही मन से अहंकार दूर होता है।

12वह प्रभु स्वयं ही क्षमा करके जीव को अपने साथ मिला लेता है॥ २॥

13विषय-विकारों का धन मनुष्य के मन में बहुत अभिमान पैदा कर देता है,

14जिसके परिणामस्वरूप वह अहंकार में डूब जाता है और दरगाह में सम्मान प्राप्त नहीं करता।

15लेकिन अपने आत्माभिमान को छोड़कर वह सदैव सुखी रहता है।

16गुरु के उपदेश द्वारा मनुष्य सत्य का ही स्तुतिगान करता है॥ ३॥

17वह कर्ता-परमेश्वर स्वयं ही सबका रचयिता है एवं

18उसके सिवाय विश्व में दूसरा कोई बड़ा नहीं।

19जिसे प्रभु स्वयं सत्य-नाम में लगाता है, वही व्यक्ति सत्य-नाम में लगता है।

20हे नानक ! नाम द्वारा प्राणी आगे परलोक में सदैव सुखी रहता है।॥४॥८॥

21रागु धनासिरी महला ३ घरु ४

22ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

23हे ईश्वर ! मैं तेरे दरबार पर भिक्षा माँगने वाला भिखारी हूँ और तू खुद ही अपना स्वामी है और सबको देने वाला है।

24हे सर्वेश्वर ! मुझ पर दयालु हो जाओ और मुझ भिक्षुक को अपना नाम प्रदान कीजिए ताकि मैं सदैव ही तेरे प्रेम-रंग में मग्न रहूँ॥१॥

25हे सच्चे परमेश्वर ! मैं तेरे नाम पर कुर्बान जाता हूँ।

26एक तू ही इस जगत, माया एवं सब जीवों को पैदा करने वाला है और तेरे सिवाय दूसरा कोई सर्वशक्तिमान नहीं है॥१॥ रहाउ॥

27हे परमपिता ! मुझ कृपण को जन्म-मरण के बहुत चक्र पड़ चुके हैं, अब मुझ पर कुछ कृपा करो।

28मुझ पर दयालु हो जाओ एवं मुझे अपने दर्शन दीजिए, मुझ पर केवल ऐसी मेहर प्रदान करो ॥ २॥

29नानक का कथन है कि भ्रम के किवाड़ (परदे) खुल गए हैं और गुरु की कृपा से सत्य को जान लिया है।

30मेरे मन में प्रभु से सच्ची प्रीति लग गई है और मेरा मन गुरु के साथ संतुष्ट हो गया है॥३॥१॥६॥

31धनासरी महला ४ घरु १ चउपदे

32ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

33हे भगवान् ! जो सन्त एवं भक्तजन तेरी आराधना करते हैं, तू उनके सभी पाप दूर कर देता हैं।

34हे मेरे स्वामी ! मुझ पर अपनी कृपा करो और मुझे उस सुसंगति में रखो, जो तुझे प्यारी लगती है॥१॥

35हे परमात्मा ! मैं तेरी महिमा कथन नहीं कर सकता।

36हम पापी पत्थर की भांति जल में डूब रहे हैं, अपनी कृपा करके हम पापी पत्थरों का उद्धार कर दीजिए॥ रहाउ॥

37मैंने अपने मन को जन्म-जन्मांतरों की लगी हुई विष रूपी माया की जंग साधसंगत में सम्मिलित होकर यूं उतार दी है,

38जैसे स्वर्ण को अग्नि में तपा कर उसकी सारी मैल को काटा एवं काट कर उतार दिया जाता है।॥२॥

39मैं दिन-रात हरि-नाम का जाप जपता रहता हूँ और हरि-नाम जपकर हरि को अपने हृदय में बसाता हूँ।

40परमात्मा का ‘हरि-हरि' नाम इस जगत में पूर्ण औषधि है और हरि-नाम का भजन करके मैंने अपने अहंकार को मार दिया है॥३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं