सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 662 · Raag Dhanaasree · Guru Nanak Dev Ji

1जिसने माँ के गर्भ की अग्नि में पैदा करके हमारे मन की रक्षा की है।

2उस परमात्मा की कृपा से जीवन-साँसें चलती हैं और जीव परस्पर बातचीत करता है॥२॥

3जितना भी मोह, प्रेम एवं स्वाद है,

4ये सभी हमारे मन को लगे हुए कालिख के केवल दाग ही हैं।

5जो मनुष्य अपने चेहरे पर पापों के धब्बे लगवा कर दुनिया से चल देता है,

6उसे प्रभु के दरबार में बैठने हेतु स्थान नहीं मिलता॥३॥

7हे परमात्मा, तेरा नाम तेरी कृपा से ही सिमरन हेतु मिलता है,

8जिससे लग कर जीव भवसागर से पार हो जाता है और इस भवसागर में डूबने से बचने के लिए नाम के अतिरिक्त दूसरा कोई सहारा नहीं है।

9यदि कोई भवसागर में डूब भी जाए तो नाम द्वारा उसकी पुनः संभाल हो जाती है।

10हे नानक ! परम-सत्य परमेश्वर सब जीवों को देने वाला है॥४ ॥३॥५॥

11धनासरी महला १ ॥

12यदि चोर किसी व्यक्ति की सराहना करे तो उसका चित्त प्रसन्न नहीं होता।

13परन्तु यदि चोर उसकी बुराई करे तो उसकी इज्जत तिनका भर भी कम नहीं होती।

14चोर की जिम्मेदारी कोई भी नहीं लेता।

15जिसे भगवान ने चोर बना दिया, वह मनुष्य भला कैसे हो सकता है।॥१॥

16हे ज्ञानहीन, लालची एवं झूठे मन ! ध्यानपूर्वक सुन,

17तेरे बिना बोले ही वह सच्चा परमेश्वर तेरे मन की भावना को जानता है॥१॥ रहाउ ॥

18चोर चाहे सुन्दर एवं अक्लमंद हो परन्तु

19उस दुराचारी का मूल्य एक कौड़ी जितना ही होता है।

20यदि उसे गुणवानों में मिलाकर रख दिया जाए तो

21परखने पर वह खोटा ही पाया जाता है।॥२॥

22सच तो यही है कि मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही उसका फल प्राप्त करता है।

23वह शुभाशुभ कर्मों का बीज बोकर स्वयं ही उसका फल खाता है।

24यदि वह स्वयं ही अपनी प्रशंसा करे तो

25जैसे उसकी समझ होती है, वैसे मार्ग पर वह चलता है॥३॥

26यदि वह अपने झूठ को छिपाने हेतु सैकड़ों झूठी बातें करे,

27चाहे सारी दुनिया उसे भला पुरुष कहे तो भी वह सत्य के दरबार में मंजूर नहीं होता।

28हे प्रभु ! यदि तुझे उपयुक्त लगे तो एक साधारण पुरुष भी परवान हो जाता है।

29हे नानक ! वह चतुर एवं अन्तर्यामी प्रभु सर्वज्ञाता है।॥४॥४॥६॥

30धनासरी महला १ ॥

31मानव की यह काया कागज है और मन इस पर लिखा हुक्म उसकी किस्मत है।

32परन्तु नादान मानव अपने मस्तक पर लिखी हुई किस्मत के लेख को नहीं पढ़ता।

33उस भगवान के दरबार में तीन प्रकार की किस्मत के लेख लिखे जाते हैं।

34देख लो, खोटा सिक्का वहाँ किसी काम नहीं आता॥१॥

35हे नानक ! यदि सिक्के पर चाँदी हो तो

36हर कोई उस सिक्के को खरा-खरा कहता है॥१॥ रहाउ ॥

37काजी कचहरी में झूठा न्याय सुना कर हराम का धन खाता है।

38ब्राह्मण अपने इष्ट देवता को बलि देने के लिए जीव-हत्या करके अपने पाप उतारने हेतु तीर्थ पर जाकर स्नान करता है।

39अन्धा अर्थात् ज्ञानहीन योगी योग साधना की युक्ति नहीं जानता।

40काजी, ब्राह्मण एवं योगी यह तीनों ही जीवों हेतु विनाश का बंधन हैं॥ २॥

41सच्चा योगी वही है, जो प्रभु-मिलन की युक्ति को समझता है और

42जो गुरु की कृपा से एक ईश्वर को जानता है।

43काजी वही है, जो अपनी मनोवृति को विकारों से बदल लेता है और

44जो गुरु की कृपा से अपने अहंत्व को मार देता है।

45वास्तविक ब्राह्मण वही है, जो ब्रह्म का चिंतन करता है।

46वह भवसागर में से स्वयं तो पार होता ही है और अपने समस्त वंश को भी पार करवा देता है॥ ३॥

47वही आदमी अक्लमंद है, जो अपने मन को स्वच्छ करता है।

48वास्तविक मुसलमान वही है, जो अपने मन की अपवित्रता को दूर करता है।

49वही मनुष्य विद्वान है, जो सत्य को समझता है और ऐसा मनुष्य प्रभु को स्वीकार हो जाता है।

50ऐसा मनुष्य वही होता है, जिसके माथे पर सत्य के दरबार की स्वीकृति का चिन्ह लगा होता ॥४॥५॥७॥

51धनासरी महला १ घरु ३

52ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

53यह योग्य समय नहीं है, इस युग में योग-साधना नहीं हो सकती और सत्य-साधना के मार्ग पर भी चला नहीं जा सकता।

54जगत के सभी पूजा-स्थल भ्रष्ट हो गए हैं और यूं समूचा जगत ही तृष्णाग्नि के समुद्र में डूबता जा रहा है॥१॥

55इस कलियुग में राम का नाम सभी धर्म-कर्मों से श्रेष्ठ साधन है।

56दुनिया को धोखा देने के लिए पाखण्डी ब्राह्मण अपनी ऑखे मिटकर अपना नाक पकड़ कर कहता है।॥१॥ रहाउ ॥

57समाधिस्थ होकर पाखण्डी अपने अँगूठे एवं दोनो ऊंगलियों से अपने नाक को पकड़ कर कहता है कि मुझे आकाश, पाताल एवं पृथ्वी ये तीनों लोक दिखाई देते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं