सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 659 · Raag Sorath · Bhagat Ravi Daas Ji

1मैंने तो तुझ से सच्ची प्रीति जोड़ ली है और

2तुम से प्रीति जोड़कर दूसरों के साथ नाता तोड़ लिया है।३ ।

3जहाँ-जहाँ भी मैं जाता हूँ. वहाँ ही मैं तेरी आराधना करता हूँ।

4हे प्रभु जी ! तुझ जैसा ठाकुर एवं पूज्य देव दूसरा कोई नहीं।४ ।

5तुम्हारा भजन करने से मृत्यु की फाँसी कट जाती है।

6तेरी भक्ति प्राप्त करने के लिए रविदास तेरा ही गुणगान करता है॥ ५॥ ५॥

7इस मानव शरीर की दीवारें जल की बनी हुई हैं, जिसके नीचे पवन का स्तंभ स्थापित किया हुआ है और इसे माँ के रक्त एवं पिता के वीर्य का गारा लगा हुआ है।

8यह शरीर मॉस एवं नाड़ियों का बना हुआ एक ढाँचा है, जिसमें बेचारा जीव रूपी पक्षी निवास करता है।१।

9हे नश्वर प्राणी ! इस दुनिया में क्या मेरा है और क्या तेरा है?

10यह बात यूं है जैसे वृक्ष पर पक्षी का बसेरा होता है॥१॥ रहाउ ॥

11तू गहरी बुनियाद खोद कर उन पर महल बनाने के लिए दीवारें खड़ी कर रहा है

12परन्तु तेरे शरीर की सीमा अधिक से अधिक साढ़े तीन हाथों की है ॥२ ॥

13तेरे सिर पर सुन्दर केश हैं और तू सिर पर तिरछी पगड़ी सुशोभित करता है

14किन्तु तेरा यह शरीर एक न एक दिन भस्म की ढेरी बन जाएगा।३।

15लेकिन ऊँचे महलों एवं सुन्दर पत्नी के प्रेम में पड़कर

16राम नाम के बिना तूने अपनी जीवन-बाजी हार दी है।४।

17मेरी जाति नीच है और मेरा गोत्र नीच है तथा मेरा जन्म भी औछा ही है।

18रविदास चमार का कथन है हे राजा राम ! फिर भी मैंने तेरी ही शरण ली है| ५ ॥ ६ ॥

19मैं चमार गाँठना नहीं जानता परन्तु

20लोग मुझसे अपने जूते बनवाते हैं॥ १ ॥ रहाउ ॥

21मेरे पास आर नहीं हैं, जिससे मैं जूतों को गाँठु और

22न ही मेरे पास खुरपी है, जिससे मैं जोड़ लगा सकूं।१।

23अपने आपको जगत से जोड़-जोड़ कर लोग बिल्कुल नष्ट हो गए हैं।

24लेकिन बिना गांठे ही मैं प्रभु के पास पहुँच गया हूँ।।२।

25रविदास तो राम के नाम का ही भजन करता रहता है और

26अब उसका यम से कोई काम नहीं रहा ॥३॥७॥

27रागु सोरठि बाणी भगत भीखन की

28ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

29अब बुढ़ापे में मेरी यह अवस्था हो गई है कि नयनों में से जल बहता रहता है और तन भी क्षीण हो गया है तथा ये बाल दूध जैसे सफेद हो गए हैं।

30मेरा गला बंद हो गया है, जिस कारण में एक शब्द भी नहीं बोल सकता। मेरे जैसा नश्वर जीव अब क्या कर सकता है? । ॥ १ |

31हे बनवारी ! हे राम ! तुम स्वयं ही वैद्य बनकर

32अपने संतों को बचा लो ॥१॥ रहाउ ॥

33मेरे माथे में पीड़ा, शरीर में जलन एवं हृदय में दर्द है।

34मेरे भीतर ऐसी भयानक वेदना उत्पन्न हो गई है कि जिसकी कोई औषधि नहीं।२।

35हरि का नाम अमृतमयी निर्मल जल है और यह औषधि इस जगत में समस्त रोगों का निदान है।

36भीखन का कथन है कि गुरु की कृपा से मैंने मोक्ष का द्वार प्राप्त कर लिया है॥३॥१॥

37हे भाई! परमात्मा का नाम ऐसा रत्न है जो बड़ा अमूल्य है।मैंने यह नाम-पदार्थ अपने पूर्व किए शुभ कर्मों के कारण प्राप्त किया है।

38अनेकों यत्न करके मैंने इसे अपने हृदय में छिपा कर रखा परन्तु यह रत्न छिपाए छिपता नहीं।।१।

39मुझ से वैसे ही भगवान की महिमा बताने से बताई नहीं जा सकती

40जैसे कोई गूँगा आदमी मिठाई खा कर उसका स्वाद नहीं बता सकता ॥१॥ रहाउ ।

41ईश्वर का नाम जिह्म से जप कर, कानों से सुनकर एवं चित से स्मरण करके मुझे सुख की अनुभूति हुई है।

42भीखन का कथन है कि मेरे यह दोनों नयन संतुष्ट हो गए हैं। अब मैं जिधर भी देखता हूँ, उधर ही भगवान दिखाई देता है॥२॥२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं