सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 654 · Raag Sorath · Guru Amar Daas Ji

1तू स्वयं ही सृष्टि-रचना करता है और स्वयं ही आखिरकार इसका विनाश करता है।

2एक तेरा शब्द (हुक्म) ही सर्वव्यापी है और जो कुछ भी तू करता है, वही होता है।

3जिन गुरुमुख को तुम बड़ाई प्रदान करते हो, वही अपने हरि प्रभु को पा लेता है।

4हे नानक ! गुरु ने हरि-नाम की आराधना की है, सभी तन-मन से कहो, वह गुरु धन्य-धन्य-धन्य है॥२६॥१॥ शुद्ध

5रागु सोरठि बाणी भगत कबीर जी की घरु १

6ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

7हिन्दू तो अपने देवताओं की मूर्तियों की पूजा-उपासना कर-करके मर गए हैं और मुसलमान भी सिर झुका-झुका कर अर्थात् सिजदा करते हुए मर गए हैं।

8हिन्दू मरणोपरांत पार्थिव देह को श्मशान घाट में ले जाकर जला देते हैं और मुसलमान मृतक को भूमि में दफन कर देते हैं। हे ईश्वर ! इन हिन्दू एवं मुसलमानों दोनों को ही तेरी महिमा का पता नहीं लगा ॥१॥

9हे मेरे मन ! इस समूचे संसार में तो गहरा अन्धेरा ही विद्यमान है और

10चारों दिशाओं में मृत्यु का जाल फैला हुआ है॥१॥ रहाउ ॥

11कई कवि कविताएँ पढ़-पढ़कर व्यर्थ ही मर गए हैं और गुदड़ी धारण करने वाले कई साधु केदारनाथ तीर्थ पर जाकर ही मर गए हैं।

12कई जटाधारी योगी पर्वतों की चोटियों में व्यर्थ ही मर गए है। परन्तु हे ईश्वर ! तेरी गति इन्हें भी ज्ञात नहीं हुई॥२॥

13कई प्रसिद्ध राजा भी धन-दौलत को संचित कर-करके सोने-चांदी के भार को दबाते ही मर गए हैं।

14पण्डित भी वेदों को पढ़-पढ़कर मर गए हैं और कई सुन्दर नारियाँ भी अपना सुन्दर रूप ही देख-देख कर मर गई हैं॥३॥

15हे मानव ! अपने मन में भलीभाति निरीक्षण करके देख लो, राम-नाम के बिना सभी नष्ट हो गए हैं।

16कबीर तो यही उपदेश करता है केि हरि-नाम के बिना किसे मोक्ष की प्राप्ति हुई है॥४ ॥१ ॥

17जब मनुष्य प्राण त्याग देता है तो उसका शरीर जला दिया जाता है और जलकर राख हो जाता है। यदि मृत शरीर को दफना दिया जाए तो उसे कीड़ों का दल ही खा जाता है।

18जैसे मिट्टी की कच्ची गागर जल डालने से टूट जाती है, वैसे ही इस कोमल तन की बड़ाई है, जितना गागर का महत्व है।॥१॥

19हे भाई ! तू क्यों घमण्ड में अकड़ा हुआ फिर रहा है ?

20वे दिन तुझे कैसे भूल गए हैं, जब तू दस महीने माता के गर्भ में उल्टे मुँह लटका हुआ था ? ॥१॥ रहाउ ॥

21जैसे मधुमक्खी शहद इकठ्ठा करती रहती है, वैसे ही मूर्ख मनुष्य जीवन भर धन-दौलत ही संचित करता रहता है।

22जब मनुष्य प्राण त्याग देता है तो सभी कहते हैं कि इस मृत शरीर को श्मशान ले जाओ, ले जाओ और इस भूत को क्यों यहाँ पर रखा हुआ है ?॥२॥

23उस मृतक व्यक्ति की पत्नी घर की दहलीज तक उसके साथ जाती है और आगे उसके सभी सज्जन एवं संबंधी जाते हैं।

24सारा परिवार एवं सभी लोग शमशान जाते हैं और उसके उपरांत आत्मा अकेली ही रह जाती है।॥३॥

25कबीर जी कहते हैं कि हे प्राणी ! जरा ध्यानपूर्वक सुनो तुझे काल (मृत्यु) ने ग्रास बनाया हुआ है और अन्धे कुएँ में गिरे हुए हो।

26जैसे तोता भ्रम में नलकी के संग फँसा रहता है, वैसे ही मनुष्य ने स्वयं को झूठी माया के बन्धन में फँसाया हुआ है।॥४॥२॥

27वेदों एवं पुराणों के समस्त मत सुनकर हमें भी कर्म करने की आशा उत्पन्न हुई किन्तु

28सभी चतुर लोगों को काल (मृत्यु) ग्रस्त देखकर पण्डितों से निराश होकर आ गए हैं।॥१॥

29हे मन ! तुम्हारा तो एक भी कार्य सम्पूर्ण नहीं हो सका,

30चूंकि तूने राम का भजन ही नहीं किया॥१॥ रहाउ ॥

31कुछ लोग वनों में जाकर योग साधना एवं तपस्या करते हैं और कदमूल चुन कर खाते हैं।

32सिंगी का नाद बजाने वालेयोगी , वेदों में बताए कर्मकाण्ड़ करने वाले वेदी ,अलख-अलख बोलने वाले साधु एवं मौनी मृत्यु के रजिस्टर में दर्ज हैं।॥२॥

33प्रेमा-भक्ति तो मनुष्य के हृदय में प्रविष्ट नहीं हुई और उसने अपने तन को बना संवार कर ही मृत्यु को सौंप दिया है।

34वह तो केवल राग-रागनियों को धारण करने वाला ढोंगी ही बनकर बैठता है किन्तु उसमें उसे प्रभु से क्या मिल सकता है?॥३॥

35मौत का खौफ समूचे जगत के ऊपर मंडरा रहा है और भ्रम में पड़े हुए ज्ञानी भी मृत्यु के रजिस्टर में लिखे हुए हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं