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गुरु ग्रंथ साहिब 653 · Raag Sorath · Guru Raam Daas Ji

1हे नानक ! जिन्होंने हरि-नाम रूपी तीर्थ में स्नान किया है, वे पवित्र पावन हो गए हैं॥२६॥

2श्लोक महला ४॥

3गुरुमुख के मन में शांति है और उसका मन एवं तन नाम में ही समाया रहता है।

4वह नाम को ही याद करता है, नाम को ही पढ़ता है और नाम में ही सुरति लगाकर रखता है।

5अमूल्य नाम-पदार्थ को पा कर उसकी तमाम चिन्ता मिट गई है।

6गुरु के मिलाप से ही मन में नाम उत्पन्न होता है और इससे तृष्णा की तमाम भूख दूर हो जाती है।

7हे नानक ! परमात्मा के नाम में मग्न होने से वह अपने दामन में ही नाम को प्राप्त करता है॥१॥

8महला ४॥

9जिस व्यक्ति को महापुरुष सतगुरु ने धिक्कार दिया है, वह अपना घर त्याग कर हमेशा ही भटकता रहता है।

10उसके बाद उसकी बहुत ही निन्दा होती है और आगे परलोक में भी उसका मुँह काला ही होता है।

11उसके मुँह से उल्टी-सीधी व्यर्थ बातें ही निकलती हैं और वह नित्य ही मुँह से झाग निकालता हुआ अर्थात् निन्दित कर्म करता हुए प्राण त्याग देता है।

12किसी के कुछ करने से क्या संभव हो सकता है? जबकि उसके पूर्व कर्मो के कारण उसका ऐसा ही भाग्य लिखा था।

13वह जिधर भी जाता है, वहाँ झूठ ही बोलता है और झूठा ही माना जाता है। उसका झूठ बोलना किसी को भी अच्छा नहीं लगता।

14हे भाई ! हे संतजनो ! अपने स्वामी प्रभु का बड़प्पन देखो, जैसा कोई कर्म करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।

15सत्य के दरबार में यही ब्रह्म -विचार होता है, इसलिए नानक इसे पूर्व ही कह कर सुना रहा है॥२॥

16पउड़ी॥

17सच्चे गुरु ने सत्संगति रूपी एक उत्तम गांव का निर्माण किया है और उस गांव के लिए स्वयं ही रखवाले दिए हैं।

18गुरु के चरणों में मन को मग्न करने से हमारी आशा पूर्ण हो गई है।

19हमारा गुरु बेअन्त कृपालु है, जिसने हमारे सभी अवगुण नाश कर दिए हैं।

20गुरु ने अपनी कृपा करके हमें अपना बना लिया।

21नानक तो सदैव ही उस पर बलिहारी जाता है, जिस गुरु के भीतर इतने अनन्त गुण हैं।॥२७॥

22श्लोक महला १॥

23हे पण्डित ! अब क्या कर सकते हैं ? चूंकि उस परमात्मा की इच्छानुसार जो लिखा है, वही प्राप्त होना है।

24जब उसका हुक्म हुआ था, तो तेरी किस्मत का निर्णय हो गया था और उसके हुक्म अनुसार ही जीव अपना जीवन-आचरण करता है॥१॥

25महला २॥

26सृष्टि के प्रत्येक प्राणी की नाक में उस मालिक की हुक्म रूपी नुकेल पड़ी हुई है, सबकुछ उसके ही वश में है और जीव के किए हुए कर्म ही उसे धकेलते हैं।

27हे नानक ! केवल यही सत्य है कि जहाँ भी जीव का भोजन-निर्वाह है, वहीं वह इसे खाने के लिए जाता है।॥२॥

28पउड़ी॥

29जगत-रचना की सब योजनाएँ परमात्मा ने स्वयं बनाकर नियत कर रखी हैं।

30वह स्वयं ही जगत-रचना करके स्वयं ही इसका नाश कर देता है।

31वह स्वयं ही सब जीवों को पैदा करके स्वयं ही उनका पालन-पोषण करता है।

32वह अपने सेवकों को अपने गले से लगाकर रखता है और कृपा-दृष्टि से उन्हें निहाल कर देता है।

33हे नानक ! परमात्मा के भक्त सदैव ही आनंदित रहते हैं और दैतभाव को जला देते हैं॥२८ ॥

34श्लोक महला ३॥

35हे मन ! तू एकाग्रचित होकर सच्चे मन से भगवान का ध्यान कर।

36उस परमेश्वर की महिमा सदैव महान् है, जो जीवों को देन देकर पश्चाताप नहीं करता।

37मैं तो उस ईश्वर पर सदैव बलिहारी जाता हूँ, जिसकी उपासना करने से सुख पाया जाता है।

38हे नानक ! गुरुमुख शब्द द्वारा अपने आत्माभिमान को जलाकर सत्य में ही लीन रहते हैं ॥१॥

39महला ३॥

40परमात्मा ने स्वयं ही जीवों को अपनी सेवा में लगाया है और स्वयं ही उन पर अपनी कृपा करता है।

41वह स्वयं ही सबका माता-पिता है और स्वयं ही सबकी देखभाल करता है।

42हे नानक ! जो भक्तजन नाम की आराधना करते हैं, उनका अपना वास्तविक घर प्रभु-चरणों में निवास हो जाता हैं और युगों-युगान्तरों में उनकी ही शोभा होती है॥२॥

43पउड़ी॥

44हे सृजनहार प्रभु ! तू सबकुछ करने एवं कराने में समर्थ है और तेरे बिना मेरा कोई सहारा नहीं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं