गुरु ग्रंथ साहिब 64 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji
1यह संसार कालिख की कुटिया है। शरीर, आत्मा एवं मनुष्य तन सब उसके साथ काले हो जाते हैं।
2लेकिन जिनकी गुरु जी स्वयं रक्षा करते हैं, वह निर्मल हैं और ईश्वर के नाम के साथ वह तृष्णाओं की अग्नि को बुझा देते हैं।॥ ७ ॥
3हे नानक ! सम्राटों के सम्राट परमेश्वर के सत्यनाम के साथ मनुष्य भवसागर पार कर जाता है।
4हे प्रभु ! मुझे आपका हरि-नाम कदापि विस्मृत न हो, मैंने हरि के नाम का आभूषण खरीद लिया है।
5स्वेच्छाचारी भयानक भवसागर में माया-लिप्त होने के कारण नष्ट हो जाते हैं परन्तु गुरमुख भवसागर से पार हो जाते हैं॥ ८॥ १६॥
6श्रीरागु महला १ घरु २ ॥
7यदि कोई प्राणी सांसारिक गृह को अपना स्थाई निवास समझकर बैठा रहे, परन्तु फिर भी उसे यहाँ से गमन कर जाने की (मृत्यु की) सदैव चिन्ता लगी रहती है।
8इस संसार घर को स्थाई निवास तभी समझा जा सकता है, यदि इस जगत् ने सदैव स्थिर रहना हो, परन्तु यह जगत् तो क्षणभंगुर है॥१॥
9यह दुनिया स्थाई कैसे हो सकती है?
10इसलिए श्रद्धायुक्त होकर शुभ कर्म करके सदाचरण की कमाई कर और ईश्वर भक्ति में लीन रह ॥१॥ रहाउ॥
11योगी ध्यान-अवस्था में आसन बनाकर विराजमान होता है और मुल्लां विश्राम स्थल पर विराजता है।
12ब्राह्मण ग्रंथों का पाठ करते हैं और सिद्ध देव-मन्दिरों में वास करते हैं ॥२॥
13देवता, सिद्ध-पुरुष, शिवगण, गंधर्व, ऋषि-मुनि, शेख, पीर, सेनापति समस्त उच्चाधिकारी
14एक-एक करके प्राण त्याग गए हैं और जो दिखाई दे रहे हैं, वे भी चले जाने वाले हैं। ॥ ३॥
15सम्राट, खान, फरिश्ते व सरदार बारी -बारी संसार त्याग गए हैं।
16प्राणी को एक क्षण या घड़ी में यह संसार त्यागना पड़ेगा। हे मेरे मन ! तुम भी वहाँ पहुंचने वाले हो, इस संसार को त्याग कर तुम भी परलोक गमन करोगे ॥४॥
17शब्दों द्वारा तो सभी कहते हैं परन्तु किसी विरले को ही इस बारे ज्ञान है।
18नानक प्रार्थना करते हैं केि वह प्रभु जल, थल, पाताल, आकाश में विद्यमान हैं। ॥५॥
19अल्लाह को जाना नहीं जा सकता। वह अगम्य एवं कुदरत का मालिक है, सृष्टि-रचयिता एवं जीवो पर मेहर करने वाला है।
20शेष सारी दुनिया जन्ग एवं मृत्यु के अधीन है। परन्तु जीवों पर मेहर करने वाला एक अल्लाह ही सदैव स्थिर है ॥६॥
21स्थिर केवल उसे ही कहा जा सकता है, जिसके सिर पर कर्मो का आलेख नहीं।
22गगन तथा धरती नष्ट हो जाएँगे परन्तु सदैव स्थिर केवल ईश्वर ही रहेगा ॥ ७॥
23दिन में उजाला करने वाला सूर्य नाश हो जाएगा और रात्रि व चाँद नष्ट हो जाएँगे और लाखों ही सितारे लुप्त हो जाएँगे।
24नानक सत्य कथन करता है कि एक अल्लाह ही स्थिर है ॥८॥१७॥
25प्रथम सतिगुरु नानक देव जी की सत्रह अष्टपदियाँ।
26श्रीरागु महला ३ घरु १ असटपदीआ
27ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
28यदि गुरु कृपा करे तो ही मनुष्य भक्ति करता है, गुरु के बिना भक्ति नहीं हो सकती।
29यदि गुरु जी दया करके अपनी संगति में रखें तो ईश्वर बोध का रहस्य समझकर प्राणी निर्मल हो जाता है।
30भगवान सत्य है और उसकी वाणी भी सत्य है। शब्द द्वारा ही प्राणी का ईश्वर से मिलन होता है॥ १॥
31हे भाई ! भक्तिविहीन प्राणी इस जगत् में क्यों आया है?
32यदि इस संसार में उसने पूर्ण गुरु की सेवा का फल प्राप्त नहीं किया तो उसने यह जीवन व्यर्थ ही गंवा दिया है ॥१॥ रहाउ॥
33ईश्वर जगत् के जीवों का दाता और जगत् का पालनहार है और क्षमा प्रदान करके तुच्छ जीवों को अपने साथ मिला लेता है।
34ये जीव-जन्तु बेचारे क्या हैं ? वह क्या कह तथा समझ-सुना सकते हैं?
35गुरमुख को ईश्वर स्वयं मान-प्रतिष्ठा प्रदान करता है और स्वयं ही अपनी भक्ति में लगाता है ॥२॥
36अपने कुटुम्ब को देखकर उसके आकर्षण में प्राणी लुभायमान हो गया है परन्तु मृत्युकाल पर कोई भी साथ नहीं देता अर्थात् परलोक गमन के समय कोई भी सदस्य साथ नहीं जाता।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं