गुरु ग्रंथ साहिब 648 · Raag Sorath · Guru Amar Daas Ji
1इस प्रकार अपने आत्माभिमान को मिटा कर गुरुमुख सारे विश्व का शासन प्राप्त कर लेता है।
2हे नानक ! जब भगवान अपनी कृपा-दृष्टि करता है, तो ही मनुष्य गुरुमुख बनकर इस तथ्य को समझता है॥१॥
3महला ३॥
4जिन्होंने गुरु के सान्निध्य में रहकर नाम का ध्यान किया है, जगत में जन्म लेकर आए वे मनुष्य ही परवान हैं।
5हे नानक ! वे अपनी वंशावलि का भी उद्धार कर लेते हैं और उन्हें भगवान के दरबार में बड़ी शोभा मिलती है।॥ २ ॥
6पउड़ी॥
7गुरुमुख सिक्ख-सहेलियों को गुरु ने अपने साथ मिला लिया है।
8इनमें से कुछ सेवक बनकर गुरु के पास रहती हैं और कुछ को गुरु ने अन्य कार्यों में लगाया है।
9जिन्हें गुरु अपने मन एवं चित में प्यारा लगता है, उन्हें गुरु अपना प्रेम देता है।
10गुरसिक्खों, मित्रों, पुत्रों एवं भाईयों से गुरु को एक-सा प्रेम होता है।
11सभी गुरु-गुरु बोलो, गुरु-गुरु कहने से गुरु ने उन्हें पुनः जीवित कर दिया है॥ १४ ॥
12श्लोक महला ३ ।
13हे नानक ! अज्ञानी एवं अन्धे व्यक्ति परमात्मा के नाम को याद नहीं करते अपितु अन्य ही कर्म करते रहते हैं।
14ऐसे व्यक्ति यम के द्वार पर बंधे हुए बहुत दण्ड भोगते हैं और अन्त में वे विष्ठा में ही नष्ट हो जाते हैं ॥१॥
15महला ३॥
16हे नानक ! जो अपने सतगुरु की सेवा करते हैं, वही सत्यशील एवं प्रामाणिक हैं।
17ऐसे सत्यवादी पुरुष हरि-नाम में ही समाए रहते हैं और उनका जीवन एवं मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है॥२॥
18पउड़ी॥
19धन, सम्पति एवं माया के पदार्थों को संचित करना अंत में बड़ा दुखदायक बन जाता है।
20घर, मन्दिर एवं महलों को संवारा जाता है, लेकिन उनमें से कोई भी इन्सान के साथ नहीं जाता।
21मनुष्य अनेक रंगों के कुशल घोड़ों को नित्य पालता है परन्तु वे भी अंत में किसी काम नहीं आते
22हे भक्तजनो ! अपना चित हरि-नाम में लगाओ, वही अंत में सहायक होगा।
23नानक ने गुरु के सान्निध्य में नाम का ही ध्यान किया है, जिसके फलस्वरूप उसे सुख प्राप्त हो गया है॥१५॥
24श्लोक महला ३॥
25भाग्य के बिना नाम की प्राप्ति नहीं होती और पूर्ण भाग्य के द्वारा ही नाम प्राप्त हो सकता है।
26हे नानक ! यदि ईश्वर अपनी कृपा-दृष्टि करे तो ही मनुष्य गुरु की मति द्वारा सत्य में मिल जाता है॥१॥
27महला १॥
28मरणोपरांत कुछ व्यक्तियों का दाह-संस्कार कर दिया जाता है, किसी को दफना दिया जाता है और कुछ लोगों को कुते इत्यादि ही खा जाते हैं।
29कुछ लोग जल-प्रवाह कर दिए जाते हैं तथा कुछ लोग सूखे कुएँ में फेंक दिए जाते हैं।
30हे नानक ! यह तो कुछ ज्ञात ही नहीं होता कि आत्मा किधर समा जाती है॥२ ॥
31पउड़ी।
32जो लोग परमात्मा के नाम में मग्न रहते हैं, उनका खाना, पहनना, धन-दौलत इत्यादि सभी पावन है।
33जिनके पास गुरुमुख सेवक, गुरु के शिष्य एवं अभ्यागत जाकर विश्राम करते हैं, उनके घर, मन्दिर, महल एवं सराय सब पवित्र हैं।
34उनके सभी घोड़े, जीन एवं खुरगीर इत्यादि पवित्र हैं, जिन पर सवार होकर गुरुमुख, गुरु के शिष्य, साधु एवं संत अपने मार्ग चल देते हैं।
35उन लोगों के सभी कर्म, धर्म एवं समस्त कार्य पवित्र हैं, जो 'हरि-हरि' बोलते एवं राम नाम का जाप करते रहते हैं।
36जिनके पास (शुभ कर्मों के फलस्वरूप) पुण्य हैं, वे गुरुमुख शिष्य गुरु के पास जाते हैं ॥१६॥
37श्लोक महला ३॥
38हे नानक ! नाम को विस्मृत करने से मनुष्य का लोक एवं परलोक सब व्यर्थ चला जाता है।
39उसकी पूजा, तपस्या एवं संयम सभी छीन लिया गया है और उसे द्वैतभाव ने ठग लिया है।
40फिर यम के द्वार पर उसे बांधकर बहुत पीटा जाता है और उसे बहुत सजा मिलती है ॥१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं