सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 644 · Raag Sorath · Guru Amar Daas Ji

1सांसारिक कार्य करता हुआ मनुष्य अपना जीवन निष्फल ही गंवा देता है और सुखों के दाता भगवान को अपने मन में नहीं बसाता।

2हे नानक ! परमात्मा का नाम उन्हें ही मिला है, जिनके भाग्य में इस तरह जन्म से पूर्व प्रारम्भ से लिखा हुआ है॥ १॥

3महला ३॥

4मन रूपी घर में ही अमृत भरपूर है किन्तु मनमुख इसके आनंद को नहीं जानते।

5जैसे कोई मृग नाभि में ही कस्तूरी होने के बावजूद उसे नहीं जानता और दुविधा में पड़ कर भटकता ही रहता है।

6स्वेच्छाचारी व्यक्ति नामामृत को त्याग कर मोह-माया रूपी विष को ही संचित करता रहता है और स्वयं को नष्ट करते रहते है,

7किसी विरले गुरुमुख को ही ज्ञान की प्राप्ति हुई है और उसने अपने अन्तर्मन में ही ब्रह्म के दर्शन किए हैं।

8फिर उसका तन एवं मन शीतल हो गया है और उसकी जिव्हा को हरि-नाम का स्वाद आ गया है।

9गुरु-शब्द से ही हृदय में नाम पैदा होता है और शब्द-गुरु ने सत्य से मेल करवाया है।

10शब्द के बिना यह समूचा जगत पागल है और इसने अपना जन्म व्यर्थ ही गंवा दिया है।

11हे नानक ! एक शब्द ही अमृत है, जिसकी उपलब्धि गुरु के माध्यम से होती है॥ २॥

12पउड़ी॥

13वह परमपुरुष प्रभु अगम्य है। बताओ, किस विधि से उसे पाया जा सकता है?

14उसका न कोई रूप है, न ही कोई चिन्ह है और वह अदृश्य है।

15हे भक्तजनो ! बताओ, उसका कैसे ध्यान-मनन किया जाए ? वह प्रभु निराकार, मायातीत एवं अपहुँच है।

16फिर क्या कहकर उसका गुणगान करें ? जिसे वह स्वयं मार्ग दर्शन करता है, वही व्यक्ति उसके मार्ग पर चल देता है।

17पूर्ण गुरु ने हमें भगवान के दर्शन करा दिए हैं और गुरु की सेवा करने से ही उसकी प्राप्ति होती है॥ ४॥

18श्लोक महला ३॥

19चाहे तिलों की तरह मेरे तन को कोल्हू में पीसा जाए और इस में से थोड़ा-सा भी रक्त नहीं रहने दिया जाये

20चाहे मेरे चार टुकड़े कर दिए जाएँ, पर सच्चे प्रभु से मेरा जो प्रेम है

21हे नानक !यह प्रभु से मिलन रात-दिन कभी भी समाप्त नहीं होगा।॥१॥

22महला ३॥

23मेरा सज्जन प्रभु बड़ा रंगीला है।

24वह अपना प्रेम प्रदान करके मन को इस तरह मोह लेता है जैसे मजीठ के साथ कपड़े रंग दिए जाते हैं।

25हे नानक ! यह रंग फिर कभी भी उतरता नहीं तथा कोई अन्य रंग मन को नहीं लगता॥२ ॥

26पउड़ी।

27परमेश्वर स्वयं ही सब जीवों में व्यापक है और वह स्वयं ही जीव को बुलवाता है।

28वह स्वयं ही सृष्टि-रचना करके जीवों को कामकाज में लगाता है।

29वह किसी को अपनी भक्ति में लगा देता है और किसी को स्वयं ही कुपथ प्रदान कर देता है।

30वह किसी को सन्मार्ग प्रदान करता है और किसी को वीराने में धकेल देता है।

31नानक तो परमात्मा के नाम का ध्यान करता और गुरु के सान्निध्य में उसका ही गुणगान करता है॥ ५॥

32श्लोक महला ३॥

33सतगुरु की सेवा तभी फलदायक है, यदि कोई इसे मन लगाकर करता है।

34इस तरह मनचाहा फल मिल जाता है और अन्तर्मन से अहंकार का नाश हो जाता है।

35ऐसा पुरुष अपने बंधनों को तोड़ कर मोक्ष प्राप्त कर लेता है और सत्य में ही समाया रहता है।

36इस दुनिया में भगवान का नाम बड़ा दुर्लभ है और गुरुमुख बन कर ही यह मन में आकर स्थित होता है।

37हे नानक ! जो अपने गुरु की सेवा करता है, मैं उस पर कुर्बान जाता हूँ॥ १॥

38महला ३॥

39मनमुख व्यक्ति का मन नियंत्रण से बाहर है, चूंकि वह तो द्वैतभाव में ही लिप्त रहता है।

40उसे स्वप्न में भी सुख की उपलब्धि नहीं होती है और वह अपना जीवन अत्यंत कष्टों में ही व्यतीत कर देता है।

41पण्डित घर-घर में जाकर धर्म-ग्रंथों का पाठ पढ़-पढ़कर और सिद्ध पुरुष समाधि लगा-लगाकर थक गए हैं।

42लोग अनेकों ही कर्म कर करके थक गए हैं परन्तु उनका यह मन वश में नहीं आता।

43अधिक वेष धारण करके बहुत सारे वेषधारी अड़सठ तीर्थों पर स्नान करके भी थक गए हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं