सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 641 · Raag Sorath · Guru Arjan Dev Ji

1हे प्यारे ! जो लोग सत्य की शरण में आते हैं, उनका अनुसरण करते हुए हम भी मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।॥ २॥

2हे प्यारे ! मनुष्य लौकिक पदार्थों को मीठा समझते हुए खाता है, लेकिन वह तो शरीर में रोग ही उत्पन्न कर देता है।

3फिर यह कड़वा होकर निकलता है और जिससे शोक ही उत्पन्न होता है।

4हे प्यारे प्रभु ! तूने जीव को सांसारिक भोगों का लुत्फ प्राप्त करने में भटकाया हुआ है और इससे उसकी वियोग की दूरी खत्म नहीं होती है।

5हे प्यारे ! जिनका गुरु के मिलन से उद्धार हो गया है, उनका ऐसा ही संयोग लिखा था ॥ ३॥

6हे प्रभु ! मनुष्य तो धन-दौलत के लालच में ही भरा हुआ है और उसके चित्त में तू कदापि स्मरण नहीं होता।

7हे परब्रह्म-परमेश्वर ! जो तुझे भुला देते हैं, उनका शरीर धूल बन जाता है।

8वे बहुत रोते-चिल्लाते हैं किन्तु उनकी पीड़ा निवृत्त नहीं होती।

9हे प्यारे ! गुरु से मिलाकर तूने जिनका जीवन संवार दिया है, उनका मूल बरकरार रह गया है॥ ४॥

10हे प्यारे मित्र ! जहाँ तक मुमकिन हो सके भगवान से विमुख मनुष्य की संगति मत करो।

11जिस विमुख को मिलकर भगवान ही भूल जाता है, फिर कुसंग के कारण मनुष्य तिरस्कृत होकर संसार से चला जाता है।

12हे प्यारे ! मनमुख व्यक्तियों को तो कहीं भी शरण नहीं मिलती और उन्हें भगवान के दरबार में कठोर दण्ड ही प्राप्त होता है।

13जो लोग गुरु से मिलकर अपना जीवन संवार लेते हैं, उनके सभी कार्य संवर जाते हैं।॥ ५॥

14हे प्यारे ! जीवन में यदि कोई व्यक्ति हजारों ही युक्तियाँ एवं चतुराईयों का प्रयोग भी क्यों न कर ले किन्तु एक भी युक्ति एवं चतुराई उसका साथ नहीं देती।

15जो परमात्मा से विमृख हो जाते हैं, उनका वंश ही कलंकित हो जाता है।

16हे प्यारे ! जो सदैव नाम रूपी वस्तु है, उसे व्यक्ति जानता ही नहीं और झूठ उसके किसी काम नहीं आने वाला।

17हे प्यारे ! ईश्वर जिसे सतगुरु से मिला देता है, वह सत्य नाम का ही चिंतन करता रहता है॥ ६॥

18हे प्यारे ! जिस पर वह अपनी कृपा-दृष्टि करता है, उसे सत्यं, संतोष, ज्ञान एवं ध्यान की प्राप्ति हो जाती है।

19फिर वह रात-दिन भगवान का ही गुणगान करता रहता है और उसका हृदय नामामृत से भरपूर हो जाता है।

20वह जीवन के दु:खों के सागर से पार होकर भवसागर से भी पार हो जाता है।

21हे प्यारे प्रभु! जिसे तू पसंद करता है, उसे अपने साथ मिला लेता है और वे सदैव ही सत्यवादी एवं भले हैं।॥७॥

22हे प्यारे ! ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, दीन-दयालु एवं ज्योतिर्मय है और भक्तों को तो उसका ही सहारा है।

23जो बड़ा अन्तर्यामी एवं दक्ष है, भक्त उसकी शरण में ही पड़े रहते हैं।

24हे प्यारे ! भगवान ने तो हमारा लोक-परलोक ही संवार दिया है और मस्तक पर सत्य का चिन्ह अंकित कर दिया है।

25हे प्यारे ! वह प्रभु कदापि विस्मृत न हो चूंकि नानक तो सदा ही उस पर कुर्बान जाता है ॥ ८॥ २॥

26सोरठि महला ५ घरु २ असटपदीआ

27ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

28मनुष्य ने अपने जीवन में विभिन्न पाठों का अध्ययन और वेदों का चिन्तन किया।उसने योगासन श्वास-नियन्त्रण एवं कुण्डलिनी की साधना भी की किन्तु फिर भी

29उसका पाँचों विकारों-काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार से साथ नहीं छूटा अपितु वह अधिक अहंकार में ही बंध गया ॥ १॥

30हे प्यारे ! मैंने भी ऐसे अनेक कर्म किए हैं। लेकिन इन विधियों द्वारा भगवान से मिलन नहीं होता,

31मैं हार-थक प्रभु के द्वार पर आ गया हूँ और उससे यही प्रार्थना करता हूँ कि हे जगत के स्वामी ! दया करके मुझे विवेक-बुद्धि दीजिए॥ रहाउ॥

32मनुष्य मौन धारण करता है, अपने हाथों का ही पतल के रूप में प्रयोग करता है, वह वनों में नग्न भटकता है और

33तीथों के तटों सहित समस्त धरती में भ्रमण करता है परन्तु फिर भी उसकी दुविधा समाप्त नहीं होती॥ २॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं