सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 63 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji

1कुमार्गी पुरुष पुत्र-पुत्रियों एवं सगे-संबंधियों को अपना मान बैठता है।

2वह अपनी गृहलक्ष्मी पत्नी को देख कर बड़ा प्रसन्न होता है। उसे हर्ष-शोक दोनों का सामना करना पड़ता है।

3पर गुरमुख गुरु-शब्दों द्वारा हरि-नाम में लिवलीन हैं और वह दिन-रात प्रभु के अमृत का आनंद लेते हैं।॥ ३॥

4शाक्त व्यक्ति का मन क्षण-भंगुर धन-दौलत की तलाश में भटकता रहता है।

5जबकि पदार्थ उनके गृह के पवित्र स्थान में है, मनुष्य उसकी बाहर तलाश करने से बर्बाद हो जाते हैं।

6गुरमुख इसको अपने दामन में प्राप्त कर लेते हैं, जबकि कुनार्गी अहंकार द्वारा इसको गंवा लेते हैं।॥४॥

7हे गुणहीन शाक्त ! तू अपने मूल की पहचान कर।

8यह शरीर रक्त और वीर्य का बना है। इसका अन्त अग्नि में जलकर राख हो जाने में है।

9यह शरीर प्राण रूप वायु के वश में है। तेरे माथे पर सच्चा निशान पड़ा हुआ है कि तूने कितने समय तक जीना है॥५॥

10प्रत्येक प्राणी लम्बी आयु की कामना करता है और कोई भी मरना नहीं चाहता।

11उसी का जीवन सुखदायक कहा जा सकता है, जिस सज्जन पुरुष के भीतर गुरु-कृपा से प्रभु वास करता है,

12नाम-विहीन प्राणी का क्या महत्त्व है जिसको भगवान का रूप गुरु के दर्शन नहीं होते॥६॥

13जिस तरह मनुष्य स्वप्न में रात्रिकाल निद्रा-मग्न रहता है, भूला फिरता है,

14इसी तरह वह प्राणी मुश्किलों में भटकता है, जिसके हृदय में अहंकार तथा द्वैत-भावना है और जो माया रूपी सर्पिणी के वश में है।

15गुरु के उपदेशानुसार ही प्राणी अनुभव करता एवं देखता है कि यह संसार केवल स्वप्न मात्र ही है॥ ७॥

16जिस तरह जल से अग्नि बुझ जाती है, जिस तरह माता के दुग्ध से शिशु संतुष्ट हो जाता है।

17जिस तरह जल के बिना कमल नहीं रहता और जिस तरह जल के बिना मछली मर जाती है,

18इसी तरह ही हे नानक ! यदि मुझे गुरु द्वारा हरि रस मिल जाए तो ही मैं भगवान की महिमा गाकर जीवित रह सकता हूँ॥ ८ ॥१५॥

19श्रीरागु महला १ ॥

20मैं अपने पीहर (इहलोक) में भयानक पर्वत देखकर सहम गई हूँ।

21पर्वत ऊँचा और चढ़ाई कठिन है। वहाँ तक पहुँचने के लिए कोई भी सीढ़ी नहीं।

22गुरु की कृपा से मैंने पर्वत को भीतर ही पहचान लिया है। गुरु ने मुझे उससे मिला दिया है और मैं (भवसागर) से पार हो गई हूँ॥१॥

23हे भाई ! भवसागर बड़ा विषम एवं भयभीत करने वाला है।

24यदि हरि रस का पान कराने वाला पूर्ण सतिगुरु मिल जाए तो गुरु उसे भगवान का नाम प्रदान करके भवसागर से पार करवा देते हैं॥१॥ रहाउ ॥

25यदि मैं कहूँ, “मैंने चले जाना है“ इसका मुझे कोई लाभ नहीं होना। परन्तु यदि मैं वास्तव तौर पर अनुभव कर लूं मैं कूच कर जाने वाला हूँ, तभी होगा।

26जो कोई भी दुनिया में आया है, वह एक न एक दिन चला जाएगा केवल करतार रूप गुरु ही अमर है।

27इसलिए सच्चे स्थान सत्संगत में मिलकर श्रद्धा से सत्य परमात्मा की महिमा-स्तुति करनी चाहिए॥२॥

28जिनके पास सुन्दर दरवाजे, मकान, मन्दिर एवं हजारों ही मजबूत किले,

29हाथी-घोड़े पालकियाँ एवं लाखों ही सेना हो,

30इन में कुछ भी किसी के साथ नहीं जाते। मूर्ख लोग व्यर्थ ही इनके लिए जूझ-जूझकर मरते हैं॥ ३॥

31मनुष्य सोना तथा चांदी कितना भी एकत्रित कर ले, परन्तु दौलत मनुष्य को फँसाने वाला जाल है।

32वह अपनी सल्तनत का ढिंढोरा सारे जगत् में करवा दें परन्तु हरि-नाम के बिना मृत्यु उसके सिर पर सवार है।

33जब मनुष्य प्राण त्याग देता है तो शरीर पार्थिव हो जाता है और जीवन का अंत हो जाता है। तब दुष्टों का क्या हश्र होगा ॥४॥

34मनुष्य अपने पुत्रों को देखकर एवं अपनी पत्नी को सेज पर निहार कर बहुत खुश होता है।

35मनुष्य शरीर पर इत्र और चन्दन लगाता है और सुन्दर वस्त्रों के साथ अपना श्रृंगार करता है।

36किन्तु जब वह प्राण त्याग कर इस संसार से चला जाता है तो शरीर मिट्टी में मिला दिया जाता है।॥५॥

37कोई व्यक्ति स्वयं को भूमिपति, महाराजा, बादशाह, उच्चाधिकारी कहलवाता है।

38कोई स्वयं को चौधरी एवं नवाब कहलवाता है परन्तु ये सभी अभिमान की अग्नि में जल मरते हैं।

39मनमुख जीव ने भगवान के नाम को भुला दिया है। वह ऐसे बन गया है जैसे जंगल को लगी अग्नि में जला हुआ सरकण्डा होता है॥६॥

40जो भी इस संसार में आया है, उसको अभिमान बुरी तरह लिपटा हुआ है और अभिमान का खेल खेलकर गमन कर जाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं