गुरु ग्रंथ साहिब 638 · Raag Sorath · Guru Amar Daas Ji
1अपने आत्माभिमान को नष्ट करके एवं तृष्णा को मन में ही मिटा कर मैंने गुरु के शब्द द्वारा परम-सत्य को पहचान लिया है॥ ४॥
2जिन लोगों को हरि का नाम प्यारा लगता है, प्रभु उनके सभी कार्य सहज ही संवार देता है।
3सभी कार्य संवारने वाला परमात्मा गुरु की अपार कृपा से सदा ही मन में बसा रहता है।
4जिनका मेरा हरि-प्रभु रखवाला है, जो उनकी रीस करता है, वह नष्ट हो जाता है॥ ५॥
5सतगुरु की सेवा किए बिना कभी किसी को परमात्मा की प्राप्ति नहीं हुई। मनमुख व्यक्ति तो रोते एवं चिल्लाते हुए ही प्राण त्याग गए हैं और
6योनि-चक्र में फँसकर जन्मते-मरते ही रहते हैं और कोई सुख का स्थान नहीं पाते। वे तो दुःख में दुखी रहकर मिट जाते हैं।
7यदि कोई गुरुमुख बन जाता है तो वह नामामृत का पान करके सहज ही सत्य में समा जाता है॥ ६॥
8सतगुरु की सेवा किए बिना मनुष्य को जन्मों का बन्धन नहीं छोड़ता, चाहे वे कितने ही प्रकार के अनेक कर्मकाण्ड करता रहे।
9जो वेदों का अध्ययन करते हैं, वे भी वाद-विवाद में ही रहते हैं और परमात्मा के बिना अपना मान-सम्मान गंवा देते हैं।
10सतगुरु सत्य है, जिसकी वाणी भी सत्य है। गुरु की शरण में आने से ही मनुष्य की मुक्ति हो जाती है।॥ ७॥
11जिनके हृदय में ईश्वर का वास हो गया है, वे उसके दरबार में सच्चे हैं और सत्य के दरबार में वे सत्यशील ही कहलाए जाते हैं।
12उनकी शोभा युगों-युगान्तरों में लोकप्रिय होती है और कोई भी इसे मिटा नहीं सकता।
13जिन्होंने भगवान को अपने हृदय में धारण किया हुआ है; नानक हमेशा ही उन पर कुर्बान जाता है॥ ८॥ १॥
14सोरठि महला ३ दुतुकी ॥
15हे भाई ! सतगुरु की सेवा में लगाकर ईश्वर स्वयं ही गुणविहीन जीवों को क्षमा कर देता है।
16सतगुरु की सेवा बड़ी उत्तम है, चूंकि इसके फलस्वरूप ही चित राम-नाम में संलग्न हो जाता है ॥ १॥
17परमेश्वर स्वयं ही जीव को क्षमा करके अपने साथ मिला लेता है।
18हे भाई ! हम बड़े गुणविहीन एवं अपराधी हैं लेकिन पूर्ण सतगुरु ने कृपा करके हमें अपने साथ मिला लिया है॥ रहाउ॥
19हे प्यारे ! शब्द गुरु का चिन्तन करने से भगवान ने कितने ही अपराधियों को क्षमा कर दिया है।
20भगवान ने सतगुरु रूपी जहाज पर सवार करवा कर कितने ही जीवों को भवसागर से पार कर दिया है॥ २॥
21हे भाई ! गुरु रूपी पारस के मिलाप में मिलन होने से हम जले हुए लोहे से स्वर्ण अर्थात् गुणवान बन गए हैं।
22आत्माभिमान को त्याग देने से नाम हमारे हृदय में बस गया है और हमारी ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो गई है॥ ३॥
23हे भाई ! मैं गुरु पर सदैव बलिहारी जाता हूँ।
24जिसने हमें नाम का भण्डार दिया है, गुर-उपदेश द्वारा हम सहज अवस्था में समा गए हैं।॥ ४॥
25गुरु के बिना सहज अवस्था उत्पन्न नहीं होती; चाहे इस बारे ज्ञानियों से जाकर पूछ लो।
26हे भाई ! अपने मन से अपने आत्माभिमान को दूर करके हमेशा ही सतगुरु की सेवा करो॥ ५॥
27गुरु की शिक्षा द्वारा प्रभु का भय-प्रेम उत्पन्न होता है और प्रभु के भय-प्रेम में किए गए सभी कर्म सत्य एवं श्रेष्ठ हैं।
28तब मनुष्य को प्रभु के प्रेम का पदार्थ (धन) प्राप्त हो जाता है और सत्य नाम ही उसका आधार बन जाता है॥ ६॥
29हे भाई जो अपने सतगुरु की निष्काम सेवा करते हैं, हम उनके चरण स्पर्श करते हैं।
30हमने अपना अमूल्य मानव-जन्म सफल कर लिया है और अपने वंश के लिए भी क्षमा-दान प्राप्त कर लिया है॥ ७॥
31हे भाई ! वाणी सत्य है और (गुरु का) शब्द भी सत्य है और इसकी उपलब्धि गुरु की कृपा से ही होती है।
32नानक का कथन है कि हे भाई ! जिसके मन में हरि-नाम का वास हो गया है, उसे कोई भी विघ्न नहीं लगता ॥ ८ ॥ २ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं