गुरु ग्रंथ साहिब 635 · Raag Sorath · Guru Nanak Dev Ji
1जिसने ज्ञान को चखा है, वही इसके स्वाद को ऐसे जानता है जैसे गूंगे व्यक्ति के लिए मिठाई का स्वाद होता है।
2हे भाई ! अकथनीय परमात्मा का मैं क्या कथन कर सकता हूँ, अतः मैं तो हमेशा उसकी इच्छानुसार ही चलता हूँ।
3यदि दाता गुरु से मिलन करवा दे तो ही सुमति प्राप्त होती है और निगुरे को तो कोई सूझ नहीं होती।
4हे भाई ! जैसे प्रभु हमें चलाता है, हमें वैसे ही चलना चाहिए, मनुष्य अन्य कौन-सी चतुराई.कर सकता है॥ ६॥
5हे परमेश्वर ! तेरी लीला अपरंपार है, चूंकि कई जीव भ्रम में ही भटकते रहते हैं और कई तेरी भक्ति में मग्न रहते हैं।
6जिधर तू लोगों को लगाता है, वे वैसा ही फल प्राप्त करते हैं और तू ही अपना हुक्म लागू करने वाला है।
7यदि मेरा कुछ अपना हो तो ही मैं तेरी सेवा करूं, मेरी यह आत्मा एवं शरीर तो तुम्हारा ही है।
8जो सतिगुरु से मिल जाता है, भगवान उस पर कृपा करता है और नामामृत ही उसका आधार बन जाता है॥ ७ ॥
9जब गुरु ने मन में गुणों का प्रकाश कर दिया तो मन दसम द्वार में जा बसा। अब मन गुणों व ज्ञान में ही ध्यान लगाता है।
10नाम ही मन को अच्छा लगता है, नाम ही जपता और दूसरों से जपाता हूँ और परम तत्व का ही बखान करता हूँ।
11शब्द गुरु ही हम सभी का पीर है, जो बड़ा गहन एवं गंभीर है। शब्द के बिना तो सारी दुनिया ही पागलो की तरह आचरण करती है।
12हे नानक ! जिसका मन सत्य नाम से निहाल हुआ है, वही पूर्ण वैरागी एवं सहज सौभाग्यशाली है॥ ८ ॥ १॥
13सोरठि महला १ तितुकी ॥
14हे भाई ! आशा एवं मनसा तो मात्र बन्धन ही हैं और धर्म-कर्म भी इन्सान को बन्धनों में फँसाने वाले हैं।
15पाप एवं पुण्य के कारण ही लोग दुनिया में जन्म लेते हैं लेकिन नाम को विस्मृत करने से मनुष्य का नाश हो जाता है।
16हे भाई ! यह माया तो दुनिया में लोगों को मोहित करने वाली ही है और माया के पीछे लगकर किए गए सभी कर्म पापपूर्ण हैं।॥ १॥
17हे कर्मकाण्डी पण्डित ! मेरी बात ध्यानपूर्वक सुन;
18जिस कर्म से सुख उत्पन्न होता है, वह कर्म आत्मतत्व का चिंतन करना है॥ रहाउ ॥
19तू खड़ा होकर शास्त्रों एवं वेदों का पाठ करता है परन्तु हे भाई ! स्वयं तो तुम सांसारिक कर्म ही करते हो।
20तेरे मन में तो विकारों की मैल भरी हुई है और यह मैल पाखण्ड करने से दूर नहीं हो सकती।
21इस तरह ही मकड़ी भी जाला बुनकर सिर के बल ही नष्ट हो जाती है॥ २॥
22दुर्मति के कारण ही बहुत सारे लोग बर्बाद हो गए हैं; हे भाई ! प्रभु के अलावा द्वैतभाव में पड़कर लोग ख्वार ही हुए हैं।
23सतगुरु के बिना नाम प्राप्त नहीं होता और नाम के बिना भ्रम दूर नहीं होता।
24हे भाई ! यदि सतिगुरु की सेवा की जाए तो ही सुख की उपलब्धि होती है और मनुष्य का जन्म-मरण का चक्र मिट जाता है॥ ३॥
25हे भाई ! सच्चा सुख तो गुरु से ही प्राप्त होता है और मन निर्मल होकर परम सत्य में समा जाता है।
26जो व्यक्ति गुरु की निष्काम सेवा करता है, उसे ही सन्मार्ग सूझता है और गुरु के बिना मार्ग नहीं मिलता।
27जिसके ह्रदय में मात्र लोभ ही भरा हुआ है, वह क्या शुभ कर्म कर सकता है? झूठ बोलकर तो वह विष ही खाता है॥ ४॥
28हे पण्डित ! यदि दही का मंथन किया जाए तो इस में से मक्खन ही निकलता है।
29यदि जल का मंथन किया जाए तो जल ही दिखाई देगा; यह जगत भी जल की तरह ही वस्तु है।
30हे भाई ! गुरु के बिना मनुष्य दुविधा में ही नष्ट हो जाता है और घट-घट में विद्यमान अलक्ष्य प्रभु से जुदा ही रहता है॥ ५॥
31हे भाई ! यह नश्वर दुनिया तो सूत के घागे की भांति है, जिसे माया ने (अपने आकर्षण में) दसों दिशाओं में बाँध कर रखा हुआ है।
32गुरु के बिना माया की गांठ नहीं खुलती और लोग कर्मकाण्ड करते हुए ही थक जाते हैं।
33हे भाई ! इस दुनिया को तो भ्रमों ने ही भटकाया हुआ है और इस बारे कुछ भी वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ६॥
34हे भाई ! गुरु को मिलने से ही प्रभु का भय-प्रेम मन में निवास करता है और उस भय प्रेम में मरना ही सच्चा लेख है।
35स्नान, दान-पुण्य एवं अन्य शुभ कर्मों से तो नाम ही भगवान के दरबार में सर्वोत्तम साधन है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं