गुरु ग्रंथ साहिब 633 · Raag Sorath · Guru Tegh Bahaadur Ji
1जब ही यह साधु की शरण में आया है तो उसकी तमाम दुर्मति का नाश हो गया है।
2हे नानक ! तब ही इसने चिंतामणि भगवान का सिमरन किया तो इसकी यम की फाँसी कट गई है ॥३॥७॥
3सोरठि महला ९ ॥
4हे मनुष्य ! अपने हृदय में इस सत्य को धारण कर लो कि
5यह समूचा जगत एक स्वप्न जैसा है और इसका विनाश होने में कोई देरी नहीं लगती॥१॥ रहाउ॥
6जैसे बनाई गई रेत की दीवार, पोतकर चार दिन भी नहीं रहती,
7वैसे ही यह माया के सुख हैं, हे गंवार मनुष्य ! तू उन में क्यों फॅसा हुआ है॥ १॥
8आज ही कुछ समझ ले चूंकि अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है और भगवान के नाम का भजन कर ले।
9नानक का कथन है कि हे मनुष्य ! संतों का यही निजी उपदेश एवं युक्ति है जो तुझे पुकार कर बता दी है॥ २॥ ८ ॥
10सोरठि महला ९ ॥
11मैंने इस दुनिया में कोई घनिष्ठ मित्र नहीं देखा है।
12सारी दुनिया अपने सुख में ही मग्न है और दुःख में कोई किसी का साथी नहीं बनता ॥ १॥ रहाउ॥
13पत्नी, मित्र, पुत्र एवं सभी रिश्तेदारों का केवल धन-दौलत से ही लगाव है।
14जब ही वे मनुष्य को निर्धन होता देखते हैं तो सभी उसका साथ छोड़कर दौड़ जाते हैं।॥ १॥
15मैं इस बावले मन को क्या उपदेश दूँ ? इसने तो केवल इन सभी स्वार्थियों से ही स्नेह लगाया हुआ है।
16इसने उस प्रभु का यश भुला दिया है जो दीनों का स्वामी एवं सभी भय नाश करने वाला है॥ २॥
17मैंने अनेक यत्न किए हैं परन्तु यह मन कुत्ते की पूंछ की तरह टेढ़ा ही रहता है और सीधा नहीं होता।
18नानक का कथन है कि हे ईश्वर ! अपने विरद् की लाज रखो; चूंकि मैं तो तुम्हारा ही नाम-सिमरन करता हूँ॥ ३॥ ६ ॥
19सोरठि महला ९ ॥
20हे मन ! तूने गुरु के उपदेश को तो ग्रहण नहीं किया,
21फिर सिर मुंडवा कर भगवा वेष धारण करने का क्या अभिप्राय है? ॥ १॥ रहाउ॥
22सत्य को छोड़कर झूठ के साथ लगकर तूने अकारण ही अपना अमूल्य जीवन बर्बाद कर दिया है।
23तू अनेक छल-कपट करके अपने पेट का पोषण करता है और पशु की भांति सोता है॥ १॥
24तूने राम भजन के महत्व को नहीं समझा और स्वयं को माया के हाथ बेच दिया है।
25यह बावला मन तो विषय-विकारों में ही फॅसा रहा है और नाम-रत्न को भुला दिया है॥ २॥
26यह अचेत रहता है और भगवान को स्मरण नहीं करता और अपना जन्म व्यर्थ ही बिता दिया है।
27नानक का कथन है कि हे भगवान ! तू अपने विरद् को पहचानते हुए सब का कल्याण कर, चूंकि प्राणी तो हमेशा ही भूल-चूक करने वाला है॥ ३॥ १०॥
28सोरठि महला ९ ॥
29जो पुरुष दुःख में भी दु:ख नहीं मानता अर्थात् दुःख से विचलित नहीं होता,
30जिसे सुख के साथ किसी प्रकार का कोई स्नेह नहीं और जिसे किसी प्रकार का कोई भय नहीं और जो स्वर्ण को भी मिट्टी की भांति समझता है॥ १॥ रहाउ॥
31जो न ही किसी की निन्दा करता है, न ही प्रशंसा की परवाह करता है और जिसे कोई लोभ, मोह एवं अभिमान नहीं,
32जो हर्ष एवं शोक से भी निर्लिप्त रहता है और जो न ही मान एवं न ही अपमान की ओर ध्यान देता है॥ १॥
33जो आशा एवं अभिलाषा सबको त्याग देता है, जो दुनिया में इच्छा-रहित ही रहता है,
34जिसे कामवासना एवं गुस्सा जरा भी स्पर्श नहीं करते, वास्तव में उसके अन्तर्मन में ही भगवान का निवास है॥ २॥
35जिस पुरुष पर गुरु ने अपनी कृपा की है, वही इस युक्ति से परिचित होता है।
36हे नानक ! ऐसा पुरुष भगवान के साथ यू विलीन हो जाता है, जैसे जल, जल में लीन हो जाता है॥ ३॥ ११॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं