सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 631 · Raag Sorath · Guru Arjan Dev Ji

1मैं तो अपने गुरु पर कुर्बान जाता हूँ।

2जब से, पूर्ण प्रभु मुझ पर कृपालु हुआ है, तब से लोग भी मुझ पर मेहरबान हो गए हैं॥ रहाउ ॥

3हे नानक ! मैं तो प्रभु की शरण में हैं,

4जिसने उसकी पूर्ण लाजप्रतिष्ठा बचा ली है।

5उसने सभी दुःख मिटा दिए हैं,

6अतः हे मेरे भाई! प्रभु शरण में आकर सुख भोगो॥२॥२८॥९२॥

7सोरठि महला ५ ॥

8हे मेरे ठाकुर जी ! मेरी विनम्र प्रार्थना सुनो, ये जितने भी जीव-जन्तु तूने उत्पन्न किए हैं, वे तेरे ही सहारे हैं।

9हे करने एवं कराने वाले प्रभु! अपने नाम की लाज रखो॥ १॥

10हे प्यारे प्रभु जी ! हमें अपना बनाकर अपने स्वामी होने का फर्ज निभाओ,

11चूंकि चाहे हम बुरे अथवा भले हैं, किन्तु तेरे ही हैं।॥ रहाउ॥

12सर्वशक्तिमान मालिक ने हमारी प्रार्थना सुन ली है और बंधनों को काटकर शोभायमान कर दिया है।

13नानक का कथन है कि उस प्रभु ने शोभा का वस्त्र पहना कर अपने सेवक को अपने साथ विलीन कर लिया है और समूचे जगत में लोकप्रिय कर दिया है ॥२॥२९॥९३॥

14सोरठि महला ५ ॥

15सभी सेवक भक्ति के फलस्वरूप भगवान के दरबार में बड़ी शोभा से रहते हैं और सभी जीव-जन्तु उनके वश में कर दिए हैं।

16भगवान ने तो हमेशा अपने सेवकों का साथ निभाया है और उन्हें भवसागर से पार कर दिया है॥ १॥

17उसने अपने संतों के सभी कार्य संवार दिए हैं

18हमारा सर्वव्यापी मालिक बड़ा दीनदयालु, मेहरबान एवं कृपा का भण्डार है ।॥ रहाउ ॥

19हर जगह पर हमारा आदर-सत्कार एवं अभिनन्दन होता है और हमें किसी बात की कोई कमी नहीं।

20नानक का कथन है कि भगवान अपने भक्तों को भक्ति का शोभायुक्त वस्त्र प्रदान करता है और ऐसे भगवान का तेज-प्रताप दुनिया में जान लिया है॥ २॥ ३०॥ ६४॥

21सोरठि महला ९

22ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

23हे मन ! राम से प्रेम करो।

24अपने कानों से गोविन्द के गुण सुनो और जिह्म से उसकी स्तुति के गीत गाओ। १॥ रहाउ ॥

25सत्संगति में सम्मिलित होकर भगवान का सिमरन करो, सिमरन से पतित भी पावन हो जाता है।

26हे सज्जन ! काल (मृत्यु) सर्प की भांति मुँह खोलकर चारों ओर भ्रमण कर रहा है॥ १ ॥

27इस बात को समझकर अपने मन में याद रखो कि यह काल आज अथवा कल अंतः तुझे अपना ग्रास अवश्य बना लेगा।

28नानक का कथन है कि भगवान का भजन अवश्य कर ले, चूंकि यह सुनहरी अवसर व्यतीत होता जा रहा है॥ २ ॥ १॥

29सोरठि महला ९ ॥

30मनुष्य के मन की अभिलाषा मन में ही अधूरी रह गई है,

31चूंकि न ही उसने भगवान का भजन किया है, न ही तीर्थ-स्थान पर जाकर सेवा की है, जिसके परिणामस्वरूप काल (मृत्यु) ने उसे चोटी से पकड़ लिया है॥ १॥ रहाउ॥

32पत्नी, दोस्त, पुत्र, रथ, संपति, बेशुमार धन-दौलत एवं सारा विश्व

33समझ लो नाशवान ही है और भगवान का भजन ही सत्य एवं सही है॥ १॥

34अनेक युगों तक भटकते-भटकते हार कर अंतः जीव को दुर्लभ मानव शरीर प्राप्त हुआ है।

35नानक का कथन है कि हे मानव ! भगवान से मिलाप का यह सुनहरी अवसर है, फिर तू उसका सिमरन क्यों नहीं करता ? ॥ २ ॥ २ ॥

36सोरठि महला ९ ॥

37हे मन ! तूने कैसी कुमति धारण की हुई है?

38तूने राम की भक्ति नहीं की और तू पराई नारी एवं निन्दा के स्वाद में मग्न है॥ १॥ रहाउ॥

39तूने मुक्ति के मार्ग को नहीं जाना लेकिन धन-दौलत संचित करने के लिए इधर-उधर दौड़ रहा है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं