गुरु ग्रंथ साहिब 629 · Raag Sorath · Guru Arjan Dev Ji
1पूर्ण गुरु की आराधना करने से
2सभी कार्य सिद्ध हो गए हैं।
3मेरे सभी मनोरथ भी पूरे हो गए हैं और
4मन में अनहद नाद बजते हैं।॥ १॥
5हे संतो ! राम का भजन करने से सुख की उपलब्धि हुई है।
6संतों के पावन स्थान पर निर्मल सहज सुख पा लिया है और सभी दुःख मिट गए हैं।॥ १॥ रहाउ॥
7पूर्ण गुरु की मधुर वाणी
8परब्रह्म-परमेश्वर के मन को लुभाती है।
9दास नानक ने वही बखान किया है जो
10प्रभु की निर्मल अकथनीय कहानी है ॥ २॥ १८ ॥ ८२ ॥
11सोरठि महला ५ ॥
12जैसे किसी भूखे पुरुष को खाते वक्त लज्जा नहीं आती
13वैसे ही प्रभु-भक्त नि:संकोच प्रभु का गुणगान करता है॥ १॥
14अपने कार्य (प्रभु-भक्ति) को करने में क्यों आलस्य करें ?
15जिसका सिमरन करने से प्रभु-दरबार में मुख उज्ज्वल होता है और हमेशा ही सुख की उपलब्धि होती है॥ १॥ रहाउ॥
16जैसे कामुक व्यक्ति कामवासना में ही तल्लीन रहता है,
17वैसे ही प्रभु के भक्त को प्रभु का यशगान ही अच्छा लगता है॥ २ ॥
18जैसे माता अपने बालक के साथ मोह में लिपटी रहती है,
19वैसे ही ज्ञानवान व्यक्ति प्रभु-नाम की साधना में ही मग्न रहता है।॥३॥
20नानक का कथन है कि पूर्ण गुरु से नाम-सिमरन की प्राप्ति होती है,
21और वह प्रभु-नाम का ही ध्यान करता है॥ ४॥ १६ ॥ ८३ ॥
22सोरठि महला ५ ॥
23मैं अपने घर में सकुशल आ गया हूँ और
24निन्दकों का मुँह काला हो गया है अर्थात् निन्दक लज्जित हो गए हैं।
25पूर्ण गुरु ने मुझे प्रतिष्ठा का परिधान पहना दिया है और
26मेरे समस्त दु:खों का विनाश हो गया है॥ १॥
27हे भक्तजनो ! यह सच्चे परमेश्वर का बड़प्पन है,
28जिसने मेरी अदभुत शोभा बनाई है॥ १॥ रहाउ ॥
29मैं तो मालिक की रज़ा में ही बोलता हूँ और
30यह दास तो ब्रह्म-वाणी का ही बखान करता है।
31हे नानक ! वह प्रभु बड़ा सुखदायक है,
32जिसने पूर्ण सृष्टि का निर्माण किया है ॥२॥२०॥८४॥
33सोरठि महला ५ ॥
34अपने प्रभु का हृदय में ध्यान करते हुए
35हम सकुशल घर लौट आए हैं।
36अब संसार को संतोष प्राप्त हो गया है चूंकि
37पूर्ण गुरु ने उसे भवसागर से तार दिया है॥ १॥
38हे भक्तजनो ! मेरा प्रभु हमेशा ही मुझ पर दयालु है।
39वह अपने भक्त के कर्मों का लेखा-जोखा नहीं करता और अपनी संतान की भांति उसकी रक्षा करता है॥ १॥ रहाउ ॥
40मैंने तो अपने हृदय में भगवान का नाम ही धारण किया हुआ है और
41उसने मेरे सभी कार्य संवार दिए हैं।
42पूर्ण गुरु ने प्रसन्न होकर नाम-दान दिया है,
43अतः नानक को पुनः कोई कष्ट नर्हीं हुआा॥ २॥ २१॥ ८५ ॥
44सोरठि महला ५ ॥
45मेरे मन-तन में हरि का निवास हो गया है,
46जिसके फलस्वरूप अब सभी मेरा मान-सम्मान कर रहे हैं।
47यह पूर्ण गुरु का बड़प्पन है कि
48उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता ॥ १॥
49हे प्रभु ! मैं तेरे नाम पर कुर्बान जाता हूँ।
50हे मेरे प्यारे ! जिसे तू क्षमा कर देता है, वही तेरा यश गाता है॥ १॥ रहाउ॥
51हे ईश्वर ! तू मेरा महान् स्वामी है और
52संतों को तेरा ही भरोसा है।
53नानक का कथन है कि प्रभु की शरण में आने से
54निन्दकों का मुँह काला हो गया है॥ २॥ २२॥ ८६॥
55सोरठि महला ५ ॥
56हे मेरे मित्र ! भूतकाल-भविष्यकाल (लोक-परलोक) में
57मेरे लिए प्रभु ने सुख एवं आनंद कर दिया है।
58परमेश्वर ने ऐसा विधान बनाया है कि
59मेरा मन फिर कहीं ओर डांवाडोल नहीं होता ॥१॥
60मेरा मन अब तो सच्चे परमेश्वर में लीन हो गया है और
61मैंने उस प्रभु को निरन्तर सर्वव्यापी जान लिया है॥ १॥ रहाउ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं