गुरु ग्रंथ साहिब 626 · Raag Sorath · Guru Arjan Dev Ji
1जब सुखों के सागर गुरु को पाया तो मेरे सभी भृम मिट गए॥ १॥
2सृष्टि में हरि-नाम की ही बड़ाई है।
3इसलिए मैं तो आठ प्रहर उसका ही गुणगान करता हूँ और
4यह देन हमें पूर्ण गुरु से प्राप्त हुई है॥ रहाउ॥
5प्रभु की कहानी अकथनीय है।
6उसके भक्तजन अमृत वाणी बोलते रहते हैं।
7हे नानक ! उस दास ने ही वाणी का ही बखान किया है
8जिसने पूर्ण गुरु से अमृत-वाणी का ज्ञान प्राप्त कर लिया है॥२॥२॥६६॥
9सोरठि महला ५ ॥
10यहाँ पहले गुरु ने सुख दिया है और
11भविष्य में भी उसने कुशलक्षेम की व्यवस्था कर दी है।
12मुझे तब सर्व सुखों का भण्डार मिल गया
13जब अपने गुरु का हृदय में मैंने ध्यान किया ॥ १॥
14यह मेरे अपने सतगुरु की बड़ाई है कि
15मुझे मनोवांछित फल प्राप्त हो गए हैं।
16हे संतो ! गुरु की बड़ाई में दिन-प्रतिदिन वृद्धि हो रही है॥ रहाउ॥
17सभी जीव मुझ पर दयालु हो गए हैं, मेरे प्रभु ने स्वयं ही उन्हें ऐसा किया है।
18हे नानक ! परमात्मा सहज स्वभाव ही मिल गया है और मेरा मन सत्य से प्रसन्न हो गया हैII २II ३II ६७ ॥
19सोरठि महला ५ ॥
20गुरु का शब्द मेरा रखवाला है और
21यह हमारे चारों तरफ की हिफाजत कर रहा है।
22मेरा मन राम-नाम में लीन हो गया है,
23जिसके फलस्वरूप मृत्यु का देवता भी लज्जित होकर भाग गया है॥ १॥
24हे प्रभु जी ! तू मेरा सुखों का दाता है।
25पूर्ण पुरुष विधाता बन्धन काटकर मन निर्मल कर देता है॥ रहाउ॥
26हे नानक ! अविनाशी प्रभु की
27सेवा-भक्ति निष्फल नहीं जाती।
28हे प्रभु ! तेरेभक्त आनंद करते हैं।
29चूंकि तेरा जाप करके उनकी आशा पूर्ण हो गई है॥ २॥ ४॥ ६८ ॥
30सोरठि महला ५ ॥
31मैं अपने गुरु पर कुर्बान जाता हूँ,
32जिसने पूर्णतया मेरी लाज-प्रतिष्ठा बरकरार रखी है।
33मुझे मनोवांछित फल की प्राप्ति हो गई है और
34मैंने हमेशा ही अपने प्रभु का ध्यान किया है॥ १॥
35हे संतो ! ईश्वर के अलावा दूसरा कोई साथी नहीं,
36चूंकि वह ही करने कराने में समर्थ है॥ रहाउ॥
37मेरे प्रभु ने मुझे ऐसा वरदान दिया है कि
38सभी जीव मेरे वश में कर दिए हैं।
39दास नानक ने जब प्रभु का नाम-स्मरण किया तो
40उसके सभी दुःख मिट गए ॥२॥५॥६९॥
41सोरठि महला ५ ॥
42पूर्ण गुरु ने हरिगोविन्द का ज्वर दूर कर दिया है और
43अब घर में अनहद बाजे बज रहे हैं।
44प्रभु ने सर्व कल्याण किया है और
45अपनी कृपा करके उसने स्वयं ही सुख घर में दिया है॥ १॥
46सतगुरु ने स्वयं ही हमारी विपत्ति दूर की है।
47हरि-नाम का ध्यान करने से सभी शिष्य एवं संत प्रसन्न हो गए हैं।॥ रहाउ॥
48जो कुछ संत मांगते हैं, वही वे पा लेते हैं।
49प्रभु अपने संतों को सब कुछ देता है।
50प्रभु ने श्री हरिगोविन्द की रक्षा की है
51यह दास नानक सहजस्वभाव सत्य कह रहा है ॥२॥७॥७१॥
52सोरठि महला ५ ॥
53हे प्रभु ! जो तुझे भला लगता है, मुझ से वही करवा।
54चूंकि मुझे तो अन्य कोई भी चतुराई नहीं आती।
55मैं बालक तेरी शरण में आया हूँ।
56प्रभु ने आप ही मेरी लाज-प्रतिष्ठा बचाई है॥ १॥
57हे हरि-परमेश्वर ! तुम ही मेरे माता-पिता हो और
58तुम ही कृपा करके हमारा पालन-पोषण करते हो, मैं वही कुछ करता हूँ जो तुम मुझ से करवाते हो॥ १॥ रहाउ ॥
59हे प्रभु ! समस्त जीव-जन्तु तेरी ही रचना है और
60उनकी जीवन-डोर तुम्हारे हाथ में ही है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं