सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 625 · Raag Sorath · Guru Arjan Dev Ji

1ठाकुर प्रभु दयालु एवं कृपालु होकर स्वयं ही विनती सुनता है।

2जब पूर्ण सतगुरु उसके संग मिला देता है, तब मन की सारी चिंता मिट जाती है।

3हे नानक ! गुरु ने हरि-नाम की औषधि भेरे मुँह में डाल दी है और अब मैं सुखी रहता हूँ॥४॥ १२॥ ६२॥

4सोरठि महला ५ ॥

5प्रभु का सिमरन करने से मुझे आनंद प्राप्त हो गया है और मेरे सभी दु:ख एवं क्लेश दूर हो गए हैं।

6अपने प्रभु का गुणगान एवं ध्यान करते हुए हमारे सभी कार्य संवर गए हैं॥ १॥

7हे ईश्वर! तुम्हारा नाम जगत का जीवन है।

8पूर्ण गुरु ने हमें उपदेश दिया है कि प्रभु का जाप करने से ही भवसागर से पार हुआ जा सकता है॥ रहाउ॥

9हे प्रभु ! तू स्वयं ही मंत्री है, तू स्वयं सबकी प्रार्थना सुनता है और तू ही सबकुछ करने वाला है।

10तू स्वयं ही दाता है, स्वयं ही भोग भोगने वाला है, यह जीव बेचारा तो लाचार है?॥ २॥

11मैं तेरे कौन-से गुणों का बखान करूँ ? चूंकि तेरे गुणों का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

12तेरी महिमा बड़ी अदभुत है चूंकि तेरे दर्शन-दीदार करके ही हम जीवित रहते हैं।॥ ३॥

13स्वामी प्रभु ने स्वयं ही अपनी मेहर करके हमारी लाज एवं बुद्धि को सुशोभित कर दिया है।

14नानक तो हमेशा ही प्रभु पर बलिहारी जाता है और संतों की चरण-धूलि की कामना करता है॥ ४॥ १३॥ ६३॥ l

15सोरठि मः ५ ॥

16पूर्ण गुरु को हमारा शत्-शत् नमन है,

17प्रभु ने हमारे सभी कार्य संवार दिए हैं।

18भगवान ने मुझ पर अपनी कृपा की है और

19उसने हमारी पूर्ण लाज-प्रतिष्ठा सुशोभित की है॥ १॥

20वह अपने दास का सहायक बन गया है।

21कर्ता-प्रभु ने हमारे सभी मनोरथ पूरे कर दिए हैं और कोई बात की कमी नहीं रह गई॥ रहाउ॥

22कर्ता-पुरुष ने अमृत सरोवर दिलवाया है।

23माया हमारे पीछे लगकर चली आई है और

24अब हमें किसी वस्तु की कोई कमी नहीं।

25मेरे पूर्ण सतगुरु को यूं ही भला लगता है ॥ २॥

26दयालु परमात्मा का सिमरन करने से

27सभी लोग मुझ पर कृपालु हो गए हैं।

28उस मालिक की जय-जयकार है,

29जिसने पूर्ण दिया हुआ रचना का विधान किया है॥ ३॥

30हे प्रभु ! तू मेरा महान् मालिक है।

31यह पुण्य पदार्थ सबकुछ तेरा ही दिया हुआ है।

32नानक ने तो एक ईश्वर का ही ध्यान किया है और

33उसे सर्व फलों के पुण्य की प्राप्ति हो गई है॥ ४॥१४॥ ६४॥

34सोरठि महला ५ घरु ३ दुपदे

35ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

36रामदास सरोवर का इतना महात्म्य है कि इसमें स्नान करने के फलस्वरूप

37पिछले किए हुए सभी पाप नाश हो जाते हैं।

38इस सरोवर में स्नान करने से मनुष्य पवित्र हो जाता है और

39पूर्ण गुरु ने हमें यह प्रदान किया है॥ १॥

40प्रभु ने सभी को सुख एवं खुशियों की देन प्रदान की है।

41गुरु के शब्द का चिंतन करने से सभी वस्तुएँ सही सलामत बच गई हैं अर्थात् सभी लोग भवसागर से पार हो गए है॥ रहाउ॥

42सत्संगति में शामिल होने से मन की मैल निवृत्त हो गई है और

43परब्रह्म-परमेश्वर उसका साथी बन गया है।

44नानक ने तो हरि-नाम का ही ध्यान किया है और

45आदिपुरुष प्रभु को पा लिया है॥ २॥ १॥ ६५॥

46सोरठि महला ५ ॥

47जिसे परब्रह्म याद आया है, उसका घर उसने सुख-समृद्ध कर दिया है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं