गुरु ग्रंथ साहिब 624 · Raag Sorath
1सोरठि महला ५ ॥
2पूर्ण गुरु ने मुझ पर पूरी कृपा कर दी है।
3प्रभु सर्वव्यापक है
4अब मैं कुशलक्षेम से स्नान करता हूँ।
5मैं परब्रह्म पर कुर्बान जाता हूँ॥ १॥
6अपने हृदय में मैंने गुरु के सुन्दर चरण-कमलों को धारण किया है।
7अब मुझे तिल-मात्र भी विध्न नहीं आता और मेरे सभी कार्य सम्पूर्ण हो गए हैं।॥ १॥ रहाउ॥
8जिन्होंने संतों से मिलकर दुर्मति नाश कर ली है।
9अतः वे सभी पतित भी पावन हो गए हैं।
10रामदास सरोवर का इतना महात्म्य है कि इस में स्नान करने के फलस्वरूप
11मनुष्य के किए हुए सभी पाप उतर जाते हैं।॥ २॥
12हमें नित्य ही भगवान का गुणगान करना चाहिए और
13सत्संगति में सम्मिलित होकर उसका ही ध्यान-मनन करना चाहिए।
14तब मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है,
15जब पूर्ण गुरु का हृदय में ध्यान करते हैं ॥ ३॥
16गुरु-परमेश्वर आनंद का भण्डार है।
17परमानंद प्रभु का जाप करने से ही मनुष्य आध्यात्मिक तौर पर जीवित रहता है।
18नानक ने तो भगवान के नाम का ध्यान किया है और
19उसने अपने विरद् का पालन करते हुए उसे सत्कृत किया है॥ ४॥ १०॥ ६०॥
20रागु सोरठि महला ५ ॥
21दसों दिशाओं में मेघ छत्र की भांति फैले हुए हैं और काली घटा की दामिनी की चमक भयभीत कर रही है।
22मेरी सेज अकेली है, नयनों में नींद भी नहीं आ रही चूंकि मेरा प्रियवर परदेस चला गया है॥ १॥
23हे माँ! अब तक मुझे उसका कोई सन्देश भी नहीं आया।
24इससे पूर्व जब मेरा प्रियवर एक मील भी दूर जाता था तो मुझे उसकी चार चिट्टियाँ आ जाती थीं।॥ रहाउ॥
25मैं अपने दुलारे प्रियतम को कैसे भुला सकती हूँ जो सर्वगुणसम्पन्न एवं सुखों का दाता है।
26मैं छत पर चढ़कर अपने प्रियतम का मार्ग देखती हूँ और मेरे नयन भी अश्रुओं से भरे हुए हैं।॥ २॥
27अहंत्व एवं आत्माभिमान की दीवार मेरे एवं उसके मध्य पड़ी हुई है। मैं सुनती हूँ कि वह मेरे हृदय देश में निकट ही रहता है।
28मेरे प्रियतम के मध्य तितली के पंखों जैसा सूक्ष्म पद है और उसके दर्शनों के बिना मैं उसे दूर ही समझती हूँ॥ ३॥
29सबका मालिक मुझ पर कृपालु हो गया है और उसने मेरे समस्त दुःख मिटा दिए हैं।
30हे नानक ! जब गुरु ने अहंत्व की दीवार ध्वस्त कर दी तो मैंने दयालु विठ्ठल भगवान को पा लिया ॥ ४॥
31हे माँ! मेरे सभी भय अब दूर हो गए हैं,
32जो मेरी कामना थी, गुरु ने मुझे उससे मिला दिया है।
33मेरा प्रभु तो सर्वगुणों का खजाना एवं बादशाह है॥ रहाउ दूसरा ॥ ११॥ ६१॥
34सोरठि महला ५ ॥
35निराकार परमात्मा खोई हुई वस्तु को दिलाने वाला, कैद से स्वतंत्र करने वाला एवं दुःखों का नाशक है।
36मैं तो लोभ एवं माया का पुजारी हूँ जो कोई शुभकर्म एवं धर्म नहीं जानता।
37हे ईश्वर ! मेरा नाम गोविन्द का भक्त पड़ गया है, अतः अपने नाम की लाज रखो ॥ १॥
38हे ईश्वर ! तू सम्मान-हीन व्यक्तियों का सम्मान है।
39मेरा गोविन्द नाचीज़ व्यक्तियों को भी गुणवान बना देता है। मैं तेरी कुदरत पर कुर्बान जाता हूँ॥ रहाउ॥
40जैसे बालक स्नेह एवं स्वभाववश लाखों ही अपराध करता है और
41चाहे उसका पिता उसे अनेक तरीकों से उपदेश देता एवं झिड़कता है परन्तु अन्तः वह उसे अपने गले से लगा लेता है।
42इस तरह परमपिता परमेश्वर भी जीवों के पिछले अवगुणों को क्षमा कर देता है और भविष्य हेतु सन्मार्ग प्रदान कर देता है॥ २॥
43अन्तर्यामी प्रभु समस्त विधियाँ जानता है तो फिर किस के समक्ष अपनी वेदना सुनाई जा सकती है?
44निरा बातें एवं खुशामद करने से गोविन्द प्रसन्न नहीं होता, यदि उसे उपयुक्त लगे तो ही वह मनुष्य की लाज बचाता है।
45हे स्वामी ! मैंने अन्य सभी आश्रय देख लिए हैं, मुझे एक तेरा ही आश्रय रह गया है॥ ३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं