सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 61 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji

1सत्य ईश्वर के यशोगान से उन्हें सहज अवस्था की उपलब्धि होती है और मनुष्य बहुत शोभा प्राप्त करता है। वे हरि नाम के सहारे रहते हैं।

2हे प्रभु ! जिस तरह तुझे अच्छा लगता है, वैसे ही तुम मुझे रखो चूंकि तेरे अलावा मेरा अन्य कोई नहीं ॥३॥

3निरंतर ग्रंथों के अध्ययन करके मनुष्य भूल में पड़ जाते हैं और धार्मिक वेष धारण करके वे बहुत अभिमान करते हैं।

4तीर्थ स्थल पर स्नान करने का क्या लाभ है, जबकि उसके चित्त में अहंकार की मैल है?

5मन शरीर रूपी नगरी का राजा है, सुलतान है। इसे गुरु बिना अन्य कौन समझा सकता है॥४॥

6गुरु द्वारा वास्तविकता को सोचने-समझने से प्रभु-प्रेम का धन प्राप्त होता है।

7अपने आपको गुरु के शब्द द्वारा श्रृंगार कर, पत्नी ने अपना अहंकार निवृत्त कर दिया है।

8गुरु के अपार प्रेम द्वारा वह अपने गृह के भीतर ही उस प्रीतम को प्राप्त कर लेती है॥ ५॥

9गुरु की चाकरी और सेवा करने से मन निर्मल हो जाता है और उसे सुख की उपलब्धि होती है।

10जब गुरु का शब्द अंत:करण में निवास कर लेता है तो अभिमान भीतर से निवृत्त हो जाता है।

11इससे नाम रूपी दौलत प्राप्त हो जाती है और आत्मा सदैव लाभ अर्जित करती है॥ ६॥

12यदि हम पर परमात्मा की अनुकंपा हो तो हमें नाम प्राप्त होता है। हम अपने साधन से इसे प्राप्त नहीं कर सकते।

13इसलिए अहंकार का नाश करके गुरु के आश्रय में आओ।

14सत्यनाम के साथ रंग जाने से सच्चा साहिब परमात्मा प्राप्त हो जाता है॥ ७॥

15सारे प्राणी भूल करने वाले हैं परन्तु गुरु और सृष्टिकर्ता परमात्मा ही अचूक है।

16जिसने गुरु के उपदेश द्वारा अपने मन को सुधारा है, उसका ईश्वर से स्नेह हो जाता है।

17हे नानक ! जिसे अपार प्रभु अपने नाम के साथ मिला लेता है। वह सत्यनाम को कदापि विस्मृत नहीं करता ॥ ८ ॥ १२॥

18श्रीरागु महला १ ॥

19मोहिनी माया की तृष्णा पुत्रों, रिश्तेदारों एवं घर की स्त्री सब को लगी हुई है।

20इस जगत् को धन, यौवन, लालच, लोभ और अहंकार ने छल लिया है।

21मोह रूपी ठग बूटी के हाथों मैं लुट गई हूँ। ऐसा हाल ही बाकी दुनिया का (इसके द्वारा) होता है ॥१॥

22हे मेरे प्रियतम प्रभु ! तुझ बिन मेरा अन्य कोई नहीं।

23तुझ बिन, अन्य कुछ भी मुझे नहीं लुभाता। तुझे प्रेम करने से मुझे सुख-शांति प्राप्त होती है ॥१॥ रहाउ॥

24गुरु के शब्द द्वारा संतोष धारण करो और प्रेमपूर्वक परमात्मा के नाम की सराहना करो।

25समस्त दृश्यमान संसार नश्वर है, इसके झूठे मोह के साथ प्रीति न लगा।

26तुम मार्ग के पथिक की भाँति आए हो अर्थात् सारा जगत् यात्री है। प्रतिदिन अपने साथियों को हम चलता देखते हैं।॥२॥

27कई पुरुष धर्मोपदेश का प्रचार करते हैं, परन्तु गुरु के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं होता।

28यदि व्यक्ति को नाम की प्रशंसा प्राप्त हो जाए तो वह सत्य के साथ रंग जाता है और मान-सम्मान पा लेता है।

29हे प्रभु ! जो तुझे अच्छे लगते हैं, वह सर्वोत्तम हैं। अपने आप कोई भी खोटा अथवा खरा नहीं ॥ ३॥

30गुरु की शरण लेने से मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है। मनमुख की पूंजी ही असत्य है।

31बादशाह की अपनी आठ धातुओं पर अधिकार होता है। उसकी इच्छानुसार ही सिक्के ढाले जाते हैं और मूल्य पाया जाता है।

32परीक्षक स्वयं ही सिक्कों की परीक्षा कर लेता है और विशुद्ध को अपने कोष में डाल लेता है ॥४॥

33हे प्रभु ! तेरा मूल्य नहीं पाया जा सकता। मैंने सब कुछ मूल्यांकन करके देख लिया है।

34कहने से उसकी गहराई नहीं पाई जा सकती। यदि मनुष्य सत्य के अंदर टिक जाए, वह सम्मान पा लेता है।

35गुरु के उपदेश द्वारा हे प्रभु ! मैं तेरी कीर्ति करता हूँ। कोई अन्य तरीका तेरी कद्र बयान करने का नहीं ॥ ५॥

36जिस तन को नाम अच्छा नहीं लगता, वह तन अहंकार वाद-विवाद का सताया हुआ है।

37गुरु के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं होता, अन्य रस पूरी तरह विषैले हैं।

38गुणों के बिना कुछ भी काम नहीं आना। धन-दौलत का स्वाद बहुत फीका है ॥६॥

39आशा में ही मनुष्य उत्पन्न हुआ है और आशा के अंदर ही वह मीठे तथा खट्टे पदार्थ सेवन करता है।

40तृष्णा में बंधा हुआ वह आगे को धकेला जाता है और अपने मुख पर पुनःपुनः चोटें खाता है।

41लेकिन गुरु की शिक्षा अनुसार नाम-सिमरन करने से उसकी मुक्ति हो जाती है ॥७ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं