सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 619 · Raag Sorath · Guru Arjan Dev Ji

1अपने परब्रह्म-प्रभु का जाप करने से मैं सदा निहाल रहता हूँ॥ रहाउ॥

2अन्दर-बाहर, देश-दिशांतर जगत में जहाँ कहीं भी मैं देखता हूँ, उधर ही भगवान मौजूद है।

3हे नानक ! बड़ी किस्मत से मुझे ऐसा गुरु प्राप्त हुआ है कि उस जैसा महान् दूसरा कोई नहीं ॥ २॥ ११॥ ३६॥

4सोरठि महला ५ ॥

5प्रभु के सुन्दर चरणों के दर्शन करने से सुख, मंगल, कल्याण एवं सहज ध्वनि की उपलब्धि हो गई है।

6रखवाले परमात्मा ने बालक हरिगोविंद की रक्षा की है और सतगुरु ने उसका ताप निवृत्त कर दिया है॥ १॥

7उस सतगुरु की शरण में बच गया हूं,

8जिसकी की हुई सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती ॥ रहाउ ॥

9जब अपना प्रभु दयालु हो गया तो घर में सुख और बाहर भी सुख ही सुख हो गया।

10हे नानक ! अब मुझे कोई भी विघ्न नहीं लगता, क्योंकि मेरा प्रभु मुझ पर कृपालु हो गया है॥ २॥ १२॥ ४०॥

11सोरठि महला ५ ॥

12साधु की संगत करने से मेरे मन में उद्यम उत्पन्न हो गया है और मैंने नाम-रत्न का यश गायन किया है।

13हे भाई ! परमेश्वर का सिमरन करने से मेरी चिन्ता मिट गई है और संसार-सागर से तर गया हूँ॥ १॥

14अपने हृदय में मैंने भगवान के चरणों को बसा लिया है।

15अब मुझे सुख प्राप्त हो गया है, सहज ध्वनि मेरे भीतर गूंज रही है एवं रोगों के समुदाय नष्ट हो गए हैं।॥ रहाउ ॥

16हे ईश्वर ! तेरे कौन-कौन से गुणों का मैं बखान करूँ ? तेरा तो मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

17हे नानक ! जब अपना प्रभु सहायक बन गया तो भक्त भी अविनाशी हो गए हैं।॥ २॥ १३॥ ४१॥

18सोरठि महला ५ ॥

19मेरे प्रभु ने अपनी कृपा की तो मेरे समस्त दुःख-क्लेश एवं रोग नाश हो गए।

20आठ प्रहर भगवान की आराधना करो चूंकि हमारी साधना भी पूर्ण हो गई है॥ १॥

21हे पूज्य परमेश्वर ! तू ही हमारी सुख-संपत्ति एवं पूंजी है।

22मेरी प्रभु के समक्ष यही प्रार्थना है कि हे मेरे प्रियतम ! मुझे दुखों से बचा लो॥ रहाउ॥

23जो कुछ भी मैं माँगता हूँ, वही कुछ मुझे प्राप्त हो जाता है, मुझे तो अपने मालिक पर ही भरोसा है।

24नानक का कथन है कि पूर्ण गुरु से भेंट हो जाने से मेरी समस्त चिन्ताएँ मिट गई है॥ २॥ १४॥ ४२॥

25सोरठि महला ५ ॥

26अपने गुरु सतगुरु का सिमरन करके मैंने अपने समस्त दु:खों-क्लेशों को मिटा लिया है।

27गुरु के वचनों द्वारा ताप एवं रोग दूर हो गए हैं तथा मुझे मनोवांछित फल की प्राप्ति हो गई है॥ १॥

28मेरा पूर्ण गुरु सुखों का दाता है।

29वह समस्त कार्य करने एवं कराने वाला, सर्वकला समर्थ स्वामी एवं पूर्ण पुरुष विधाता है॥ रहाउ॥

30हे नानक ! अब आप आनंद करो, खुशियाँ मनाओ और प्रभु की स्तुति के मंगल गीत गायन करो, चूंकि गुरु आप पर दयालु हो गया है।

31सारी दुनिया में जय-जयकार हो रही है, चूंकि परब्रह्म मेरा रखवाला हो गया है॥ २॥ १५॥ ४३॥

32सोरठि महला ५ ॥

33परमात्मा ने हमारे कर्मों की गणना नहीं की और अपने विरद् को पहचान कर हमें क्षमा कर दिया है।

34उसने अपना हाथ देकर मुझे अपना समझता हुए मेरी रक्षा की है और अब मैं उसके प्रेम का हमेशा आनंद प्राप्त करता रहता हूँ॥ १॥

35मेरा सच्चा परमेश्वर सदैव ही मेहरबान है।

36मेरे पूर्ण सतगुरु ने दु:खों-संकटों पर अंकुश लगाया है और अब सर्व कल्याण हो गया है॥ रहाउ॥

37जिस ईश्वर ने प्राण डाल कर मेरे शरीर की रचना की है और वस्त्र एवं भोजन प्रदान किया है; उसने स्वयं ही अपने दास की लाज बचा ली है।

38नानक तो उस पर सदा कुर्बान जाता है॥ ॥२॥१६॥४४॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं