गुरु ग्रंथ साहिब 616 · Raag Sorath · Guru Arjan Dev Ji
1उसने अपनी कृपा करके मुझे अपना बना लिया है और अविनाशी प्रभु मेरे मन में निवास कर गया है॥ २॥
2जिसकी रक्षा स्वयं सतगुरु करता है, उसे कोई संकट नहीं आता।
3उसके हृदय में भगवान के सुन्दर चरण कमल बस जाते हैं और वह हरि-रस अमृत को चखता रहता है॥ ३॥
4जिस प्रभु ने तेरे मन की अभिलाषा पूर्ण कर दी है, उसकी सेवा-भक्ति सेवक की भांति कर।
5दास नानक तो उस प्रभु पर कुर्बान जाता है, जिसने उसकी पूर्ण लाज-प्रतिष्ठा बचा ली है॥ ४॥ १४॥ २५ ॥
6सोरठि महला ५ ॥
7माया-मोह के अन्धेरे में मग्न होकर मनुष्य सब कुछ देने वाले दाता को नहीं जानता।
8वह उसे नहीं जानता, जिसने प्राण एवं शरीर की सृजना करके उसकी रचना की है और जो शक्ति उसके भीतर है, वह उसे ही अपना मानता है॥ १॥
9हे विमूढ़ मन ! स्वामी-प्रभु तेरे कर्मों को देख रहा है।
10जो कुछ तू करता है, वह सब जानता है और कुछ भी उससे छिपा नहीं रह सकता ॥ रहाउ॥
11जिव्हा के स्वाद एवं लालच के नशे में मदमस्त व्यक्ति के अन्दर अनेक पाप-विकार ही उत्पन्न होते हैं।
12अहंत्प के बन्धनों के बोझ के निचे अनेक योनियों में भटकता हुआ वह बहुत दुःख भोगता है॥ २॥
13द्वार बन्द करके एवं अनेक पदों के भीतर मनुष्य पराई नारी के साथ भोग-विलास करता है।
14लेकिन जब चित्रगुप्त तुझसे कर्मों का लेखा मांगेगा तो तेरे कुकर्मों पर कौन पर्दा डालेगा ?॥ ३॥
15हे दीनदयालु ! हे सर्वव्यापी ! हे दुःखनाशक ! तेरे अलावा मेरा कोई सहारा नहीं है।
16हे प्रभु ! नानक ने तेरी ही शरण ली है, इसीलिए उसे संसार-सागर में से बाहर निकाल लो॥ ४॥ १५ ॥ २६ ॥
17सोरठि महला ५ ॥
18परब्रहा-प्रभु मेरा सहायक हो गया है और उसकी कथा एवं कीर्तन सुखदायक है।
19हे प्राणी ! पूर्ण गुरु की वाणी का जाप करके नित्य आनंद करो।॥ १॥
20हे भाई ! सच्चे परमेश्वर की आराधना करो।
21सत्संगति में हमेशा सुख की प्राप्ति होती है और भगवान कभी भी विस्मृत नहीं होता॥ रहाउ ॥
22हे परमेश्वर ! तेरा नाम अमृत है, जो भी तेरा नाम-सिमरन करता है, वह जीवित रहता है।
23जिस पर परमात्मा का करम होता है, वह मनुष्य पवित्र हो जाता है॥ २॥
24मेरा मन उस गुरु के चरणों में लगा है, जो विघ्नों का विनाश करने वाला एवं सब दु:खों का नाशक है।
25अच्युत अविनाशी प्रभु का गुणगान करते हुए मैं रात-दिन हरि-रंग में जाग्रत रहता हूँ॥ ३॥
26सुखकारी हरि की कथा सुनने से मुझे मनोवांछित फल की प्राप्ति हो गई है।
27आदिकाल, मध्यकाल एवं अन्तकाल तक वह प्रभु ही नानक का साथी बना हुआ है॥ ४॥ १६॥ २७॥
28सोरठि महला ५ पंचपदा ॥
29ईश्वर करे मेरा मोह और मेरा-तेरा की भावना तथा अहंत्व का नाश हो जाए॥ १॥
30हे संतो ! मुझे कोई ऐसी युक्ति बताओ,
31जिससे मेरा आत्माभिमान एवं घमण्ड का नाश हो जाए॥ १॥ रहाउ॥
32सारी दुनिया के लोगों को मैं परब्रह्म का रूप ही मानता हूँ और सब की चरण-धूलि ही होता हूँ॥ २॥
33पूज्य परमेश्वर को हमेशा मैंने अपने साथ ही देखा है, जिससे मेरी दुविधा की दीवार ध्वस्त हो गई है॥ ३॥
34भगवान की नाम-औषधि एवं निर्मल अमृत जल की प्राप्ति गुरु के द्वारा ही होती है॥ ४॥
35हे नानक ! जिस व्यक्ति की तकदीर में लिखा हुआ है, उसने गुरु से मिलकर अपना रोग नष्ट कर लिया है॥ ५ ॥ १७ ॥ २८ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं