सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 611 · Raag Sorath · Guru Arjan Dev Ji

1हे मेरे मन ! साधुओं की शरण में आने से ही छुटकारा है।

2पूर्ण गुरु बिना जन्म-मरण का चक्र समाप्त नहीं होता अपितु जीव बार-बार दुनिया में आता जाता (जन्मता-मरता) रहता है॥ रहाउ॥

3वह जिसे भृम-भुलावा कहा जाता है, सारी दुनिया उसमें उलझी हुई है।

4परन्तु परम-पुरुष स्वामी का पूर्ण भक्त समस्त पदार्थों से न्यारा है॥ २॥

5दुनिया की किसी भी बात से निन्दा मत करो क्योंकि यह मालिक की ही रचना है।

6जिस पर मेरे प्रभु ने कृपा की हुई है, वह संतों की पावन सभा में प्रभु-नाम का भजन करता है॥ ३॥

7परब्रह्म, परमेश्वर सतगुरु सबका उद्धार करता है।

8हे नानक ! गुरु बिना भवसागर से पार नहीं हुआ जा सकता, यही पूर्ण तत्व विचार है॥ ४॥ ६॥

9सोरठि महला ५ ॥

10खोजते-खोजते खोजकर मैंने इस बात पर निष्कर्ष किया है कि राम का नाम ही श्रेष्ठ है।

11एक क्षण भर भी इसकी आराधना करने से सब पाप मिट जाते हैं और गुरुमुख बनकर व्यक्ति भवसागर से पार हो जाता है॥ १॥

12हे ज्ञानी पुरुषो ! हरि रस का पान करो।

13साधु रूपी गुरु की अमृतवाणी सुन-सुनकर मन को महा-तृप्ति प्राप्त होती है॥ रहाउ॥

14अमृतवाणी के फलस्वरूप ही मुक्ति, भुक्ति, युक्ति एवं सत्य की प्राप्ति होती है, जो सर्व सुख देने वाला है।

15सर्वव्यापक अकालपुरुष विधाता अपने दास को अपनी भक्ति का दान देता है॥ २॥

16उस प्रभु की महिमा को अपने कानों से सुनना चाहिए, अपनी जिव्हा से उसका गुणगान करना चाहिए और हृदय में भी उसका ही ध्यान-मनन करना चाहिए जो

17सबकुछ करने-करवाने में समर्थ हे और जिस स्वामी के घर से कोई खाली हाथ नहीं लौटता॥ ३॥

18बड़ी किस्मत से मुझे मनुष्य जन्म रूपी रत्न प्राप्त हुआ है, हे कृपानिधि ! मुझ पर कृपा करो।

19साधसंगत में नानक परमात्मा के ही गुण गाता है और हमेशा ही उसकी आराधना करता है॥ ४॥ १०॥

20सोरठि महला ५ ॥

21स्नान करके अपने प्रभु को स्मरण करने से मन एवं तन आरोग्य हो गए हैं।

22प्रभु की शरण लेने से करोड़ों विध्न समाप्त हो गए हैं और भले संयोग उदय हो गए हैं।॥ १॥

23प्रभु की वाणी एवं शब्द शोभनीय है।

24हे भाई ! इसे नित्य गाओ, सुनो एवं पढ़ो; पूर्ण गुरु ने तुझे भवसागर में डूबने से बचा लिया है॥ रहाउ॥

25सच्चे परमेश्वर की महिमा अमित है। वह बड़ा दयालु एवं भक्तवत्सल है।

26अपने विरद् का पालन करने वाला प्रभु आदि से ही अपने संतों-भक्तों की लाज रखता आया है॥ २॥

27नित्य ही हरिनामामृत का भोजन खाओ और हर समय इसे अपने मुँह में डालो।

28नित्य गोविन्द का गुणगान करो, वृद्ध अवस्था, मृत्यु एवं समस्त दुःख-संकट भाग जाएँगे ॥ ३॥

29मेरे स्वामी ने मेरी प्रार्थना सुन ली है और मन में पूर्ण बल पैदा हो गया है।

30गुरु नानक की महिमा समस्त युगों में प्रगट हो गई है॥ ४॥ ११॥

31सोरठि महला ५ घरु २ चउपदे

32ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

33एक (परमेश्वर) ही हमारा पिता है और हम सब एक पिता-परमेश्वर की ही संतान हैं। तू ही मेरा गुरु है।

34हे मेरे मित्र ! सुनो, यदि तू मुझे हरि-दर्शन करवा दे तो मेरा मन तुझ पर बार-बार न्योछावर होगा ॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं