गुरु ग्रंथ साहिब 60 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji
1हे मेरे मन ! प्रभु से प्रेम के बिना तेरी मुक्ति किस तरह होगी ?
2भगवान तो गुरु के हृदय में निवास करता है और वह जीवों को भक्ति के भण्डार प्रदान करता है अर्थात् गुरु की कृपा से ही भक्ति प्राप्त होती है।॥१॥ रहाउ॥
3हे मेरे मन ! ईश्वर से ऐसी प्रेम-भक्ति कर जैसी मछली की जल से है।
4जितना अधिक जल बढ़ता है उतना अधिक सुख प्राप्त करती है। मछली आत्मा, तन व शरीर में सुख-शांति अनुभव करती है।
5जल के बिना वह एक क्षण मात्र भी जीवित नहीं रहती। स्वामी उसके ह्रदय की पीड़ा को जानता है ॥२ ॥
6हे मेरे मन ! ईश्वर से ऐसी प्रीति कर, जैसी चात्रिक की बारिश से प्रीति है।
7यदि वर्षा की बूंद इसके मुख में न पड़े, तो इसको लबालव भरे तालाबों एवं हरी-भरी धरती का क्या लाभ है?
8यदि परमेश्वर की कृपा-दृष्टि हो तो वह बारिश की बूंदों की बौछार करेगा, अन्यथा अपने पूर्व कर्मो अनुसार वह अपना शीश दे देता है ॥३॥
9हे मेरे मन ! तू परमेश्वर के साथ ऐसी प्रीति कर जैसी जल की दूध के साथ है।
10जल स्वयं तपस बर्दाश्त करता है और दूध को जलने नहीं देता ।
11ईश्वर स्वयं ही बिछुड़ों का मिलन करवाता है और स्वयं ही सत्य द्वारा प्रशंसा प्रदान करता है ॥४॥
12हे मेरे मन ! प्रभु से ऐसी प्रीति कर जैसी चकवी की सूर्य के साथ है।
13वह एक क्षण या एक पल के लिए सो नहीं सकती; सूर्य बहुत दूर है, लेकिन वह सोचती है कि यह निकट है।
14कुमार्गी पुरुष को सूझ नहीं पड़ती। गुरमुख के लिए प्रभु सदैव निकट ही है ॥५॥
15स्वार्थी प्राणी लेखा-जोखा करते हैं, परन्तु जो कुछ सृजनहार की इच्छा हो, वही होता है।
16चाहे सभी जैसी इच्छा करें, उसका मोल नहीं पाया जा सकता।
17परन्तु, गुरु की शिक्षा अनुसार इसका बोध होता है। परमात्मा से मिलन द्वारा सुख प्राप्त होता है।॥६॥
18यदि प्राणी को सतिगुरु मिल जाएँ तो सच्ची प्रीति नहीं टूटती।
19जब मनुष्य को ज्ञान प्राप्त हो जाता है तो फिर उसे आकाश, पाताल, मृत्युलोक तीनों लोकों की सूझ हो जाती है।
20यदि प्राणी प्रभु के गुणों का ग्राहक बन जाए तो वह पवित्र नाम को कदापि विस्मृत नहीं करता ॥७॥
21जो जीव रूपी पक्षी संसार सागर के तट पर दाना चुगते थे, वह जीवन बाजी खेल कर चले गए हैं।
22प्रत्येक जीव ने एक घड़ी अथवा मुहूर्त उपरांत यहाँ से चले जाना है।
23उसकी खुशी का खेल आज अथवा कल के लिए है। हे प्रभु ! तुझे वहीं मिलता है, जिसे तुम स्वयं मिलाते हो। वह यहाँ से सच्ची बाजी जीत कर जाता है।॥८॥
24इसलिए गुरु के बिना मनुष्य के मन में प्रभु के लिए प्रेम उत्पन्न नहीं होता और उसकी अहंकार की मलिनता दूर नहीं होती।
25जो ईश्वर की अपने हृदय में स्तुति करता है और उसके नाम के साथ बिंध गया है, उसकी तृप्ति हो जाती है।
26जब मनुष्य गुरु के ज्ञान द्वारा अपने स्वरुप को समझ लेता है, तब उसके लिए अन्य क्या करना या करवाना शेष रह जाता है ?॥९॥
27उनको परमेश्वर से मिलाने बारे क्या कहना हुआ, जो आगे ही गुरु के शब्द द्वारा उसके मिलन में है। नाम प्राप्त करने से उनको संतोष हो गया है।
28मनमुख प्राणियों को प्रभु का ज्ञान नहीं होता। ईश्वर से अलग होकर वे यमों की मार खाते हैं।
29हे नानक ! प्रभु का दर एवं घर ही जीव का एकमात्र सहारा है। उसके लिए अन्य कोई ठिकाना नहीं हैं II१०॥११॥
30श्रीरागु महला १ ॥
31मनमुख जीव-स्त्री भगवान को भूल जाती है। माया उसे मोह में फँसाकर भुला देती है। भूली हुई जीव-स्त्री को सहारा लेने हेतु कोई स्थान नहीं मिलता।
32गुरु के बिना कोई भी उसे प्रभु-मिलन का मार्ग नहीं दिखा सकता। वह ज्ञानहीन जन्मती-मरती रहती है।
33जिस ने ज्ञान-पदार्थ गंवा लिया है, वह लुट जाता है ॥१॥
34हे भाई ! माया ने भृम पैदा किया है
35इस भ्रम में पड़कर भूली हुई दुहागिन प्रभु पति के आलिंगन में नहीं आ सकती ॥१॥ रहाउ॥
36वह भूली हुई अपना घर छोड़कर चली जाती है और देश-देशांतरों में भटकती रहती है।
37संदेह के कारण उसका चित्त डगमगाता फिरता है और वह अपना सद्मार्ग भूलकर ऊँचे मैदानों तथा पर्वतों पर आरोहण करती है।
38वह आदि से ही प्रभु के हुक्म से बिछुड़ी हुई है, वह प्रभु से कैसे मिल सकती है? अहंकारवश ठगी हुई वह दुखी होकर विलाप करती है॥२॥
39गुरु जी बिछुड़ी आत्माओं का प्रभु के साथ मिलन करवा देते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रेम से नाम जप कर हरि रस का आनंद प्राप्त करते हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं