गुरु ग्रंथ साहिब 608 · Raag Sorath · Guru Raam Daas Ji
1नाम-रत्न छिपाने पर भी छिपा नहीं रह सकता चाहे कोई छिपाने की कितनी ही कोशिश करे॥ ४॥
2हे परमात्मा ! यह सारी सृष्टि तेरी ही है। तू अन्तर्यामी है और तू हम सबका प्रभु है।
3नानक का कथन है कि हे प्रभु ! जिसे तू दान देता है, वही इसे प्राप्त करता है। दूसरा कोई नहीं जो इसे तेरे बिना प्राप्त कर ले॥ ५ ॥ ६॥
4सोरठि महला ५ घरु १ तितुके
5ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
6जब सब जीवों को ईश्वर ने ही पैदा किया हुआ है तो फिर उसके अलावा मैं किससे मॉगूं? किसकी आराधना करूँ ?
7जो कोई बड़े से बड़ा आदमी दिखाई देता है, वह भी आखिरकार मिट्टी में ही मिल जाता है।
8वह निरंकार निर्भय है, संसार के जन्म-मरण के बंधन मिटाने वाला है और वह स्वयं ही सर्वसुख एवं नवनिधियाँ देता है॥ १॥
9हे श्रीहरि ! जब तेरे दिए हुए दान से मैं तृप्त हो जाता हूँ तो फिर
10मैं मनुष्य बेचारे की क्यों तारीफ करूँ ? मुझे उस पर निर्भर होने की क्या आवश्यकता है?॥ रहाउ॥
11जिसने भी भगवान का ध्यान किया है, विश्व का सब कुछ उसका हो गया है और भगवान ने उसकी तमाम भूख निवृत्त कर दी है।
12सुखों के दाता प्रभु ने ऐसा धन दिया है, जो कदापि खत्म नहीं होता।
13सतिगुरु ने मुझे उससे मिला दिया है, अब मैं बड़ा आनंदित हूँ और सहज सुख में लीन रहता हूँ॥ २॥
14हे मेरे मन ! नाम का भजन कर, नाम की आराधना कर और प्रतिदिन नाम का ही बखान कर।
15साधु-संतों का ध्यानपूर्वक उपदेश सुनकर मृत्यु का तमाम भय दूर हो गया है।
16जिन पर मेरा प्रभु कृपालु हुआ है, उसने गुरु की वाणी में वृति लगा ली है ॥ ३॥
17हे प्रभु ! तेरा मूल्यांकन कौन कर सकता है, जबकि तू तो सब जीवों पर दयालु है।
18हे परमपिता ! विश्व में सबकुछ तेरा किया ही होता है, हम जीव क्या करने में समर्थ हैं?
19हे ईश्वर ! नानक तेरा ही दास है, उसकी इस तरह रक्षा कर, जैसे पिता अपने पुत्र पर कृपालु होता है॥ ४॥ १॥
20सोरठि महला ५ घरु १ चौतुके ॥
21हे भाई ! अपने मन, तन एवं हृदय में प्रेम बसाकर गोविन्द-गुरु की स्तुति करनी चाहिए।
22सच्चा परमेश्वर हृदय में बसा रहे, यही सर्वश्रेष्ठ जीवन-आचरण है।
23जिस शरीर में भगवान का नाम उत्पन्न नहीं होता, वह शरीर भस्म हो जाता है।
24मैं उस सत्संगति पर मन-तन से न्यौछावर हूँ, जिसे केवल एक परमेश्वर का ही सहारा है॥ १॥
25हे भाई ! उस परम-सत्य परमेश्वर की ही आराधना करो, जिससे सबकुछ उत्पन्न हुआ है।
26पूर्ण गुरु ने ज्ञान करवा दिया है कि उस एक परमेश्वर के अलावा अन्य कोई समर्थ नहीं॥ रहाउ ॥
27हे भाई ! परमेश्वर के नाम बिना कितने ही गल सड़ कर मर गए हैं, जिनकी गणना नहीं की जा सकती।
28सत्य के बिना पवित्रता प्राप्त नहीं होती और वह मालिक सत्यस्वरूप एवं अगम्य है।
29हे भाई ! सांसारिक पदार्थों का अहंकार झूठा है और इन में मग्न होने से जन्म-मरण का चक्र नष्ट नहीं होता।
30हे भाई ! गुरुमुख मनुष्य परमात्मा के नाम का एक कण-मात्र ही प्रदान करके करोड़ों की मुक्ति कर देता है॥ २॥
31हे भाई ! स्मृतियों तथा शास्त्रों का मैंने भलीभांति विश्लेषण किया है परन्तु सतगुरु के बिना भ्रम दूर नहीं होता।
32मनुष्य अनेक कर्म करके थक जाता है लेकिन फिर भी बार-बार वह बन्धनों में ही पड़ता है।
33हे भाई ! मैंने चारों-दिशाओं में पड़ताल कर ली है लेकिन सतगुरु के अलावा मुक्ति का कोई मार्ग नहीं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं