सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 607 · Raag Sorath · Guru Raam Daas Ji

1वह स्वयं ही प्राणियों के गले में जीवन की डोर डालता है और जैसे प्रभु उन्हें खींचता है, वैसे ही प्राणी जीवन-मार्ग की ओर जाते हैं।

2नानक का कथन है कि हे प्यारे ! जो व्यक्ति केवल घमण्ड ही करता है, उसका अंत हो जाता है। इसलिए ईश्वर का नाम जपकर उसकी भक्ति में ही लीन रहो।॥ ४॥ ६ ॥

3सोरठि मः ४ दुतुके ॥

4अनेक जन्मों से भगवान से जुदा हुआ मनमुख पुरुष अत्यंत दुःख ही भोग रहा है और वह तो अहंकार के वशीभूत होकर कर्म करने में सक्रिय है।

5साधु रूपी गुरु के चरण-छूने से ही प्रभु की प्राप्ति हो गई है। हे गोविन्द ! मैं तो तुम्हारी शरण में ही आया हूँ॥ १॥

6गोविन्द की प्रीति मुझे अत्यन्त प्यारी लगती है।

7जब साधुओं के साथ मेरा सत्संग हुआ तो मुझे मेरे हृदय में ही शांति प्रदान करने वाला मुरारि प्रभु प्राप्त हो गया।॥ रहाउ॥

8हे भगवान ! तू हम जीवों के हृदय में ही गुप्त रूप में रहता है लेकिन हम गंवार तुम्हारे स्नेह को नहीं समझते।

9महापुरुष सतगुरु के मिलाप से प्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन हो गए हैं। अब तो मैं उसका ही यशगान करता हूँ और प्रभु के गुणों पर ही चिंतन करता हूँ॥ २॥

10गुरु के सान्निध्य में रहकर मेरा मन उज्ज्वल हो गया है और शांति प्राप्त होने के कारण मेरे मन में से खोटी बुद्धि दूर हो गई है।

11हे सतगुरु ! तुम्हारी सत्संगति के फलस्वरूप आत्मा में ही बह्म को जान कर मुझे सुख प्राप्त हो गया है॥ ३॥

12हे प्रभु ! जिन पर तुम्हारी अपार कृपा हुई है, उन्हें गुरु प्राप्त हो गया है और गुरु से साक्षात्कार करके उन्हें तेरी प्राप्ति हो गई है।

13हे नानक ! उसे अतुलनीय सहज सुख प्राप्त हो गया है और वह अब प्रतिदिन भगवान में मग्न होकर जाग्रत रहता है॥ ४ ॥ ७ ॥

14सोरठि महला ४ ॥

15हरि के प्रेम से मेरा मन बिंध गया है एवं हरि के बिना में रह नहीं सकता।

16जैसे मछली जल के बिना नाश हो जाती है, वैसे ही जीवात्मा हरि-नाम बिना मर जाती है॥ १॥

17हे मेरे प्रभु ! मुझे हरि-नाम रूपी कृपा-जल प्रदान कीजिए।

18मैं अपने मन में दिन-रात नाम ही माँगता रहता हूँ और नाम से ही शांति प्राप्त होती है॥ रहाउ ॥

19जैसे पपीहा जल के बिना तड़पता रहता है और जल के बिना उसकी प्यास नहीं बुझती;

20वैसे ही गुरु के माध्यम से ही ब्रह्म रूपी जल का सुख प्राप्त होता है और वह प्रभु-प्रेम से सहज ही प्रफुल्लित हो जाता है॥ २ ॥

21मोह-माया के भूखे मनमुख पुरुष दसों दिशाओं में भटकते रहते हैं और नाम से वंचित रहने के कारण अत्यंत दु:ख भोगते हैं।

22ऐसे लोग जन्मते-मरते रहते हैं, पुनः पुनः योनियों में आते हैं और भगवान के दरबार में उन्हें कठोर दण्ड मिलता है॥ ३॥

23यदि भगवान कृपा करे तो मनुष्य हरि का गुणगान करता है और उसे हृदय में ही हरि-रस प्राप्त हो जाता है।

24हे नानक ! भगवान दीनदयालु है, जिस पर वह दयालु होता है, उसकी शब्द के माध्यम से तृष्णा बुझा देता है॥ ४॥ ८॥

25सोरठि महला ४ पंचपदा ॥

26यदि मनुष्य अजेय मन पर विजय प्राप्त कर ले तो उसे सिद्धि की प्राप्ति होती है और सिद्धि के फलस्वरूप ही ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है।

27जब भगवान के प्रेम के तीर तन के भीतर लगते हैं तो भ्रम दूर हो जाता है॥१॥

28हे मेरे गोविन्द ! अपने सेवक को अपने नाम की बड़ाई प्रदान करो।

29गुरु के उपदेश द्वारा ही अपना राम नाम मेरे हृदय में उज्ज्वल करो चूंकि मैं हमेशा ही तुम्हारी शरण में पड़ा रहूँ॥ रहाउ॥

30हे मूर्ख एवं अचेतन मन ! यह सारी दुनिया आवागमन (जन्म मरण) के वशीभूत है, इसलिए केवल भगवान का ही भजन करो।

31हे श्रीहरि ! मुझ पर कृपा करो और मुझे गुरु से मिला दो तांकि मैं तेरे हरि-नाम में लीन हो जाऊँ॥ २॥

32जिसकी अनमोल वस्तु यह नाम है, वह प्रभु ही इसे जानता है। जिसे यह अनमोल वस्तु देता है, वही इसे प्राप्त करता है। यह नाम-वस्तु अत्यंत अनूप, अगम्य, अगोचर है और पूर्ण गुरु के द्वारा ही अलक्ष्य वस्तु प्रगट होती है॥ ३॥

33जिसने इसे चखा है, वही इसके स्वाद को जानता है। जैसे गूंगा मिठाई का स्वाद नहीं बता सकता यह वैसे ही है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं