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गुरु ग्रंथ साहिब 606 · Raag Sorath · Guru Raam Daas Ji

1प्यारा प्रभु आप ही लकड़ी भी है और लकड़ी में उसने स्वयं ही अग्नि को रखा हुआ है।

2वह प्यारा स्वयं ही लकड़ी एवं अग्नि दोनों में क्रियाशील है और उसके भय कारण अग्नि लकड़ी को जला नहीं सकती।

3मेरा प्रियतम प्रभु स्वयं ही मारकर पुनः जीवित करने वाला है और सभी लोग उसकी दी हुई सांसें लेते हैं।॥ ३॥

4वह प्यारा प्रभु स्वयं ही शक्ति और अटल दरबार है और स्वयं ही उसने जीवों को कामकाज में लगाया हुआ है।

5हे प्यारे ! जैसे वह स्वयं चलाता है, वैसे ही हम चलते हैं, जैसे मेरे हरि-प्रभु को अच्छा लगा है।

6वह स्वयं ही संगीतकार और संगीत (यंत्र) है। हे नानक ! | मनुष्य वैसे ही बजता है, जैसे प्रभु उसे बजाता है॥ ४॥ ४॥

7सोरठि महला ४ ॥

8प्यारा प्रभु स्वयं ही सृष्टि-रचना करके सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश करता है।

9वह प्यारा प्रभु स्वयं ही निर्बलों का बल है और स्वयं ही आदरहीन व्यक्तियों का आदर-सत्कार है।

10वह स्वयं ही दया करके सबकी रक्षा करता है और स्वयं ही बुद्धिमान एवं सर्वज्ञाता है॥ १॥

11हे मेरे मन ! राम-नाम का भजन कर, यह नाम ही दरगाह में जाने के लिए परवाना है।

12सत्संगति में सम्मिलित होकर तू परमेश्वर का सिमरन कर, जिसके फलस्वरूप तेरा फिर जन्म-मरण नहीं होगा।॥ रहाउ ॥

13वह प्यारा प्रभु स्वयं ही समस्त गुणों में सक्रिय है और स्वयं ही सत्कृत होता है।

14वह स्वयं ही जीवों पर बखसीस करता है और स्वयं ही सत्य के चिन्ह की देन प्रदान करता है।

15वह प्यारा स्वयं ही हुक्म में सक्रिय रहता है और स्वयं ही फुरमान करता है॥ २॥

16वह प्यारा स्वयं ही भक्ति का भण्डार है और स्वयं ही भक्ति का दान प्रदान करता है।

17प्यारा प्रभु स्वयं ही जीवों से अपनी उपासना करवाता है और स्वयं ही दुनिया में मान-सम्मान दिलाता है।

18वह स्वयं ही शून्य-समाधि लगाता है और स्वयं ही गुणों का खजाना है॥ ३॥

19प्यारा प्रभु स्वयं ही महान् है और स्वयं ही प्रधान है।

20वह स्वयं ही अपना मूल्यांकन करता है और स्वयं ही तराजू एवं माप है।

21वह प्यारा प्रभु स्वयं अतुलनीय है लेकिन जीवों को तोल लेता है। नानक सर्वदा उस पर कुर्बान जाता है॥ ४॥ ५ ॥

22सोरठि महला ४ ॥

23वह प्यारा प्रभु स्वयं ही जीवों को अपनी सेवा में लगाता है और स्वयं ही उनमें अपनी भक्ति की उमंग उत्पन्न करता है।

24वह स्वयं ही भक्तजनों से अपना गुणगान करवाता है और स्वयं ही अपने शब्द में समाया हुआ है।

25वह स्वयं ही कलम है, स्वयं ही लिखने वाला लिखारी है और स्वयं ही जीवों के कर्मों का लेख लिखता है॥ १॥

26हे मेरे मन ! तू उमंग से राम-नाम का भजन कर।

27भाग्यशाली जीव पूर्ण गुरु के द्वारा हरि-नाम का लाभ प्राप्त करते हैं और उनका प्रतिदिन आनंददायक होता है।॥ रहाउ॥

28प्रिय प्रभु स्वयं ही गोपी (राधा) एवं श्रीकृष्ण है और वह स्वयं ही वृंदावन में गाय चराने वाला है।

29वह स्वयं ही सांवला सुन्दर कन्हैया है और स्वयं ही मधुर ध्वनि में बांसुरी बजाने वाला है।

30उस प्यारे प्रभु ने स्वयं ही बालक का रूप धारण करके कुबलियापीड़ हाथी का वध किया था ॥ २ ॥

31वह स्वयं ही अखाड़ा बनाता है और लीलाएँ रचकर स्वयं ही उन्हें देखता है।

32वह स्वयं ही बालक कृष्ण-कन्हैया रूप में उत्पन्न हुआ और कृष्ण द्वारा चंडूर, कस एवं केशि का वध किया।

33वह प्यारा प्रभु स्वयं ही शक्ति का रूप है और वह मूर्ख एवं विमूढ़ लोगों के बल का दमन करता है॥ ३॥

34वह प्यारा प्रभु स्वयं ही समूचे जगत की रचना करता है और जगत की युक्ति उसी के वश में है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं