गुरु ग्रंथ साहिब 603 · Raag Sorath · Guru Amar Daas Ji
1हे भाई ! गुरु के बिना प्रभु-प्रीति उत्पन्न नहीं होती और मनमुख व्यक्ति द्वैतभाव में ही फँसे रहते हैं।
2मनमुख व्यक्ति जो भी कर्म करता है, वह छिलका कूटने के सादृश्य निरर्थक है, इससे उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होता।॥ २॥
3हे भाई ! गुरु से भेंट करके नाम हृदय में प्रविष्ट हो गया है और प्रभु से सच्ची प्रीति एवं प्रेम हो गया है।
4हे भाई ! गुरु के अपार प्रेम से ही मनुष्य हरि का गुणगान करता रहता है॥ ३॥
5हे भाई ! जिसने गुरु की सेवा में चित्त लगाया है, उसका दुनिया में आगमन परवान है।
6नानक का कथन है कि हे भाई ! गुरु के शब्द द्वारा प्राणी प्रभु के नाम को प्राप्त कर लेता है और उसमें विलीन हो जाता है॥ ४॥ ८ ॥
7सोरठि महला ३ घरु १ ॥
8हे भाई ! पृथ्वी, पाताल एवं आकाश-इन तीनों लोक वाला जगत त्रिगुणों- रजोगुण, तमोगुण एवं सतोगुण में पूर्णतया लीन है और गुरुमुख व्यक्ति ही इस भेद को समझ सकता है।
9हे भाई ! राम के नाम में लीन होने से ही मुक्ति प्राप्त होती है, चाहे इस संदर्भ में जाकर ज्ञानी महापुरुषों से पूछ लो॥ १॥
10हे मेरे मन ! तू त्रिगुणों (रज, तम एवं सत्व) को छोड़ दे और अपने चित्त को चौथे पद (परम पद) में लगा।
11हे भाई ! हरि ने तेरे मन में ही निवास किया हुआ है, इसलिए सर्वदा हरि का गुणगान करता रह॥ रहाउ॥
12हे भाई ! नाम से ही सभी जीव उत्पन्न हुए हैं और नाम को विस्मृत करके वे मर जाते हैं।
13हे भाई ! यह अज्ञानी दुनिया तो माया-मोह में अन्धी है तथा माया-मोह में निद्रामग्न लोग माया के हाथों लूटे जा रहे हैं॥ २ ॥
14हे भाई ! गुरुमुख व्यक्ति ही जाग्रत रहते हैं और उनका कल्याण हो जाता है तथा वे भयानक संसार-सागर से पार हो जाते हैं।
15हे भाई ! इस दुनिया में हरि का नाम ही फलप्रद है, इसलिए हमें हरि का नाम ही हृदय में रखना चाहिए॥ ३॥
16हे भाई ! गुरु की शरण में आने एवं राम नाम में सुरति लगाने से उद्धार हो जाता है।
17नानक का कथन है कि हे भाई ! नाम ही जहाज है और नाम ही बेड़ा है, जिस पर सवार होकर प्रभु के भक्तजन संसार-सागर से पार हो जाते हैं॥ ४॥ ६ ॥
18सोरठि महला ३ घरु १ ॥
19सतगुरु ही सुखों का सागर है, इस दुनिया में दूसरा कोई सुखों का स्थान नहीं है।
20सारी दुनिया अहंकार के कारण दुखों एवं रोगों से ग्रस्त है, जिसके कारण लोग जन्मते-मरते और फूट-फूट कर रोते हैं॥१॥
21हे प्राणी ! सतिगुरु की निष्काम सेवा करने से सुख उपलब्ध होता है।
22यदि तू सतगुरु की सेवा करेगा तो ही तुझे सुख मिलेगा, अन्यथा तू अपना अमूल्य जन्म गंवा कर दुनिया से विदा हो जाएगा॥ रहाउ॥
23मनुष्य त्रिगुणी माया (रज, तम, सत) के प्रभाव अधीन भाग-दौड़ करता हुआ अनेक कर्म करता है, लेकिन हरि-रस का स्वाद प्राप्त नहीं करता।
24वह संध्या-पाठ, तर्पण (पितरों को जल) एवं गायत्री मंत्र का पाठ करता है परन्तु ज्ञान के बिना वह दुःख ही भोगता है॥ २॥
25जो व्यक्ति सतिगुरु की सेवा करता है, वह बड़ा भाग्यशाली है लेकिन सतिगुरु से वही मिलता है, जिसे भगवान स्वयं मिलाता है।
26हरि-रस को पीकर भक्तजन हमेशा तृप्त रहते हैं और अपने अन्तर्मन से अपना आत्माभिमान दूर कर देते हैं।॥ ३॥
27यह दुनिया तो अन्धी है, सब लोग अज्ञानता के कर्म ही करते हैं। गुरु बिना उन्हें सन्मार्ग नहीं मिलता।
28हे नानक ! यदि सतगुरु से भेंट हो जाए तो मनुष्य ज्ञान-चक्षुओं से देखने लगता है और सत्य को अपने हृदय-घर में ही प्राप्त कर लेता है॥ ४॥ १०॥
29सोरठि महला ३॥
30गुरु की सेवा किए बिना मनुष्य अत्यन्त दु:खों में ही घिरा रहता है और चहुं युगों में भटकता फिरता है।
31हे भगवान् ! हम बड़े दीन हैं और तुम तो युगों-युगान्तरों में दाता हो, कृपा करके हमें शब्द का ज्ञान प्रदान करो॥ १॥
32हे प्रिय प्रभु ! हम पर तुम कृपा करो।
33हमें सतगुरु दाता से मिला दो और हरि-नाम का सहारा प्रदान करो॥ रहाउ॥
34मैंने अपनी अभिलाषा एवं दुविधा को मिटाकर तथा सहज अवस्था में लीन होकर अनन्त नाम को प्राप्त कर लिया है।
35पापों का नाश करने वाला हरि रस चख कर मेरा मन निर्मल हो गया है॥ २॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं