गुरु ग्रंथ साहिब 602 · Raag Sorath · Guru Amar Daas Ji
1वह उनके जन्म-जन्मान्तरों के पाप एवं कष्ट मिटा देता है और उन्हें स्वयं ही अपने साथ मिला लेता है॥ रहाउ॥
2हे भाई! यह सभी कुटुंब इत्यादि तो जीव हेतु बन्धन ही हैं और सारी दुनिया भ्रम में ही भटक रही है।
3गुरु के बिना बन्धन नष्ट नहीं होते और गुरु के माध्यम से मोक्ष का द्वार मिल जाता है।
4जो प्राणी सांसारिक कर्म करता है और गुरु के शब्द की पहचान नहीं करता, वह बार-बार दुनिया में मरता और जन्मता ही रहता है॥ २॥
5हे भाई ! यह दुनिया तो अहंत्व एवं आत्माभिमान में ही उलझी हुई है परन्तु कोई भी किसी का सखा नहीं।
6गुरुमुख पुरुष सत्य के महल को प्राप्त कर लेते हैं, सत्य का ही गुणगान करते हैं और अपने आत्मस्वरूप (भगवान के चरणों) में बसेरा प्राप्त कर लेते हैं।
7जो व्यक्ति इहलोक में स्वयं को समझ जाता है, वह अपने आत्मस्वरूप को पहचान लेता है और हरि-प्रभु उसका बन जाता है॥ ३ ॥
8हे भाई ! सतिगुरु तो हमेशा ही दयालु है परन्तु तकदीर के बिना प्राणी क्या प्राप्त कर सकता है ?
9सतिगुरु सभी पर एक समान कृपा-दृष्टि से ही देखता है परन्तु जैसी प्राणी की प्रेम-भावना होती है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।
10हे नानक ! यदि अन्तर्मन में से आत्माभिमान को दूर कर दिया जाए तो मन के अन्दर प्रभु-नाम का निवास हो जाता है॥ ४॥ ६॥
11सोरठि महला ३ चौतुके ॥
12सतगुरु के माध्यम से ही सच्ची भक्ति होती है एवं हृदय में सच्ची वाणी का निवास हो जाता है।
13गुरु की सेवा करने से सदा सुख की उपलब्धि होती है और गुरु-शब्द के माध्यम से अहंकार मिट जाता है।
14गुरु के बिना सच्ची भक्ति नहीं हो सकती और गुरु के बिना नादान दुनिया दुविधा में फॅसकर भटकती ही रहती है।
15मनमुख व्यक्ति भटकते ही रहते हैं, वे हमेशा दुःखी ही रहते हैं और जल के बिना ही डूबकर मर जाते हैं।॥ १॥
16हे भाई ! हमेशा भगवान की शरण में रहो,
17वह अपनी कृपा-दृष्टि करके जीवों की हमेशा ही लाज-प्रतिष्ठा बचाता रहता है और अपने हरि-नाम की जीवों को कीर्ति प्रदान करता है॥ रहाउ॥
18पूर्ण गुरु के माध्यम से मनुष्य सच्चे शब्द का चिंतन करने से अपने आत्माभिमान को समझ लेता है।
19वह काम, क्रोध एवं अहंकार को छोड़ देता है और जगत का जीवनदाता हरि हमेशा ही उसके हृदय में आकर निवास कर लेता है।
20अपरंपार नाम हृदय में निवास करने से प्रभु हमेशा उसे प्रत्यक्ष एवं समस्त स्थानों पर व्यापक दृष्टिमान होता है।
21युग-युगान्तरों में अनहद शब्द द्वारा ही प्रभु वाणी की पहचान हुई है और मन को नाम मधुर एवं प्यारा लगता है॥ २॥
22सतगुरु की सेवा करके जिस व्यक्ति ने नाम की पहचान कर ली है, इस दुनिया में उसका आगमन एवं जन्म सफल हो गया है।
23हरि-रस को चखकर उसका मन हमेशा के लिए तृप्त हो गया है और वह गुणों के भण्डार प्रभु का गुणगान करते हुए संतुष्ट हुआ रहता है।
24उसका हृदय-कमल प्रफुल्लित हो गया है और प्रभु के प्रेम-रंग में वह सदैव मग्न रहता है और उसके भीतर अनहद शब्द गूंजता रहता है।
25उसका तन-मन निर्मल हो गया है और वाणी भी निर्मल हो गई है और वह सत्यशील बनकर परम-सत्य में विलीन हो गया है॥ ३॥
26राम-नाम की महानता को कोई भी नहीं जानता और गुरु के उपदेश द्वारा ही यह हृदय में समाता है।
27जो व्यक्ति गुरुमुख होता है, वह मार्ग की पहचान कर लेता है और हरि-रस में ही उसकी रसना रसमग्न रहती है।
28जप, तप एवं संयम सभी गुरु से ही प्राप्त होते हैं और गुरु द्वारा ही हृदय में नाम का निवास होता है।
29हे नानक ! जो व्यक्ति नाम-सिमरन करते हैं, वे सुन्दर दिखाई देते हैं और सत्य के दरबार में बड़ी शोभा प्राप्त करते हैं॥ ४ ॥ ७ ॥
30सोरठि मः ३ दुतुके ॥
31हे भाई ! सतिगुरु से भेंट करके मेरी बुद्धि मोह-माया की तरफ से उलट गई है, यदि कोई जीवित ही विषय-विकारों की ओर से मृत रहता है तो उसे आध्यात्मिक जीवन का ज्ञान मिल जाता है।
32हे भाई ! वही गुरु है और वही सिक्ख है, जिसकी ज्योति को परमात्मा अपनी परम ज्योति से मिला लेता है॥ १॥
33हे मेरे मन ! परमात्मा के साथ सुरति लगाओ।
34हे भाई ! भजन करने से हरि जिसके मन को मीठा लगता है वह गुरुमुख व्यक्ति हरि के चरणों में स्थान प्राप्त कर लेता है॥ रहाउ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं