सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 600 · Raag Sorath · Guru Amar Daas Ji

1मनमुख विमूढ़ व्यक्ति परमात्मा के नाम को स्मरण नहीं करता और अपना जीवन व्यर्थ ही गंवा देता है।

2लेकिन यदि उसकी सतिगुरु से भेंट हो जाए तो वह नाम प्राप्त कर लेता है, जिससे उसका अहंकार एवं मोह दूर हो जाते हैं।३॥

3हरि के सेवक सत्यशील हैं, वे सत्य की साधना करते हैं और गुरु के शब्द पर चिंतन करते हैं।

4सच्चा प्रभु उन्हें स्वयं ही अपने साथ मिला लेता है और वे सत्य को अपने हृदय से लगाकर रखते हैं।

5हे नानक ! नाम के माध्यम से हमें गति एवं ज्ञान मिला है और यही हमारी पूँजी है॥ ४॥ १॥

6सोरठि महला ३ ॥

7परमात्मा ने अपनी भक्ति का खजाना भक्तों को दिया है और हरि का नाम ही उनका सच्चा धन है।

8यह अक्षय नाम-धन कदापि खत्म नहीं होता और न ही इसका मूल्यांकन किया जा सकता है।

9हरि के नाम-धन से भक्तजनों के मुख उज्ज्वल हो गए हैं और उन्हें सत्यस्वरूप हरि मिल गया है॥ १॥

10हे मेरे मन ! गुरु के शब्द द्वारा ही श्रीहरि पाया जाता है।

11यह दुनिया शब्द के बिना दुविधा में पड़कर भटकती ही रहती है और हरि के दरबार में कठोर दण्ड प्राप्त करती है॥ रहाउ॥

12इस शरीर के अन्दर पाँच चोर-कामवासना, क्रोध, लालच, मोह एवं अहंकार निवास करते हैं।

13वे नाम रूपी अमृत को लूटते रहते हैं, लेकिन मनमुख व्यक्ति इस तथ्य को नहीं समझते और कोई भी उनकी फरियाद नहीं सुनता।

14यह दुनिया अन्धी अर्थात् ज्ञानहीन है और इसके व्यवहार भी अन्धे हैं और गुरु के बिना घोर अन्धेरा है॥ २॥

15अहंकार में मैं-मेरा करते हुए प्राणी पीड़ित होते रहते हैं किन्तु जब मृत्यु का समय आता है तो कुछ भी उनके साथ नहीं जाता।

16जो व्यक्ति गुरुमुख बन जाता है वह नाम का ही ध्यान करता है और सदैव हरि-नाम की ही आराधना करता रहता है।

17वह सच्ची वाणी के द्वारा हरि का गुणगान करता है और करुणा के घर परमात्मा की करुणा-दृष्टि से कृतार्थ हो जाता है॥ ३॥

18सतगुरु का दिया हुआ ज्ञान हमेशा ही उसके हृदय को रोशन करता है और परमात्मा का हुक्म बादशाहों के सिर पर भी है।

19भक्त रात-दिन प्रभु की भक्ति करते रहते हैं और राम-नाम रूपी सच्चा लाभ प्राप्त करते हैं।

20हे नानक ! राम-नाम के फलस्वरूप ही मनुष्य की मुक्ति हो जाती है और शब्द में मग्न होने से हरि मिल जाता है।॥ ४॥ २॥

21सोरठि मः ३ ॥

22यदि मनुष्य दासों का दास बन जाए तो उसे परमात्मा मिल जाता है और वह अपने मन से आत्माभिमान को गंवा देता है।

23भक्तों का मुख्य कार्य तो आनंद रूप श्रीहरि ही है, इसलिए वे रात-दिन हरि का ही गुणगान करते रहते हैं।

24शब्द के साथ मग्न हुए वे हमेशा एक ही रंग में लीन रहते हैं और हरि में समाए रहते हैं।॥ १॥

25हे श्रीहरि ! तुम्हारी कृपा-दृष्टि सच्ची है।

26हे प्यारे ! अपने सेवकों पर कृपा करो और हमारी लाज-प्रतिष्ठा भी बरकरार रखो॥ रहाउ॥

27शब्द द्वारा स्तुतिगान करने से मैं सदैव जीवित रहता हूँ और गुरु के उपदेश द्वारा मेरा भय दूर हो गया है।

28मेरा सच्चा प्रभु अत्यंत सुन्दर है और गुरु की सेवा करने से मेरा चित्त उसमें लग गया है।

29जो व्यक्ति सच्चे शब्द एवं परम सच्ची वाणी का बोध करता है, वह दिन-रात चेतन रहता है॥ २॥

30भगवान महा गंभीर और सर्वदा सुखों का दाता है और उसका कोई भी जीव अन्त नहीं पा सकता।

31जिसने पूर्ण गुरु की सेवा की है, उसने चिन्ता से रहित हरि को अपने मन में बसा लिया है।

32उसका मन, तन निर्मल हो गया है और अन्तर्मन सदा सुखी रहता है और मन से सन्देह भी दूर हो गया है॥ ३॥

33भगवान (की उपलब्धि) का मार्ग सर्वदा ही एक विषम पथ है और कोई विरला पुरुष ही गुरु के विचार द्वारा चिंतन करते हुए इसे प्राप्त करता है।

34हरि के प्रेम-रंग में लीन एवं शब्द में मस्त हुआ व्यक्ति अपने अहंकार एवं विकारों को त्याग देता है।

35नानक तो प्रभु के नाम-रंग में रंगकर एक रंग हो गया है और ब्रह्म-शब्द उसे संवारने वाला है॥ ४॥ ३ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं