गुरु ग्रंथ साहिब 59 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji
1वह साहिब (प्रभु) अतुल्य है जिसे किसी वस्तु के समक्ष तोला नहीं जा सकता, उसकी प्राप्ति सिर्फ कहने या बाते करने से नहीं हो सकती ॥ ५ ॥
2जीव वणजारे हैं। वह जगत् में नाम का व्यापार करने आते हैं। वह प्रभु के दरबार में अपना वेतन लिखवाकर लाते हैं।
3जो सत्य की कमाई करते हैं और ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करते हैं। वह कर्म का लाभ कमाते हैं।
4सत्य की पूँजी द्वारा वही गुरु प्राप्त करते हैं, जिनको तुल्य मात्र भी लोभ-लालच नहीं ॥ ६॥
5सत्य के तराजू पर सत्य के वजन से गुरमुख प्राणियों को गुरदेव स्वयं तोलते हैं तथा अन्यों को तुलाते हैं।
6गुरु ने, जिसका वचन सत्य है, आशा-तृष्णा जो सभी को बहका लेती है, उनकी रोकथाम (गुरु) करते हैं।
7परमेश्वर कर्मो अनुसार प्राणियों को स्वयं तराजू पर तोलता है, पूर्ण पुरुष का तोल-परिमाण पूर्ण है॥ ७॥
8केवल कहने तथा बातचीत द्वारा किसी की मुक्ति नहीं होती और न ही ढेर सारे ग्रंथों के अध्ययन द्वारा।
9हरि की भक्ति और प्रीति के बिना तन की पवित्रता प्राप्त नहीं होती।
10हे नानक ! मुझे भगवान का नाम विस्मृत न हो और गुरु मुझे भगवान से मिला दे ॥ ८ ॥९ ॥
11श्रीरागु महला १ ॥
12यदि प्राणी को पूर्ण सतिगुरु मिल जाए तो उसे ज्ञान रूपी रत्न प्राप्त हो जाता है।
13यदि अपना मन अपने गुरु को अर्पित कर दे तो उसे सबका प्रेम प्राप्त हो जाता है।
14उसे गुरु से मोक्ष-रूपी धन मिल जाता है जो समस्त अवगुणों का नाश करने वाला है॥१॥
15हे भाई ! गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता।
16चाहे कोई भी जाकर ब्रह्मा, नारद एवं वेदों के रचयिता व्यास से पूछ ले॥१॥ रहाउ ॥
17ज्ञान एवं ध्यान गुरु के शब्द द्वारा ही प्राप्त होते हैं और गुरु अपने सेवक से अकथनीय हरि का वर्णन करवा देते हैं।
18गुरु जी हरे भरे, फल प्रदान करने वाले एवं छायादार पेड़ के समान हैं।
19सर्वगुण मणियाँ, जवाहर एवं पन्ने ये गुरु जी के अमूल्य भण्डार में हैं। २॥
20गुरु जी के कोष गुरुवाणी में से पवित्र-पावन नाम की प्रीति प्राप्त होती है।
21अनंत परमेश्वर की पूर्ण कृपा द्वारा हम सत्य नाम का सौदा संचित करते हैं।
22सुखों के दाता सतिगुरु सुख प्रदान करने वाले, कष्ट निवृत्त करने वाले एवं दुष्कर्मों के दैत्यों का संहार करने वाले हैं॥३॥
23यह भवसागर बड़ा विषम एवं भयानक है, इसका कोई भी तट नहीं तथा न ही उसका कोई आर-पार किनारा है।
24इसकी न ही कोई नैया, न ही कोई लकड़ी है, न ही कोई चप्पू और न ही कोई खेवट है।
25केवल सतिगुरु ही भयानक सागर पर एक जहाज है, जिसकी कृपा-दृष्टि मनुष्यों को पार कर देती है अर्थात् इहलोक से परलोक तक पहुँचाती है॥ ४॥
26यदि मैं एक क्षण भर के लिए भी प्रीतम प्रभु को विस्मृत कर दूँ तो मुझे कष्ट घेर लेते हैं तथा सुख चला जाता है।
27जो जिव्हा प्यार से ईश्वर के नाम का उच्चारण नहीं करती, उसे जल जाना चाहिए, क्योंकि नाम का उच्चारण न करने वाली जिव्हा जलाने योग्य ही है।
28जब देहि का घड़ा टूट जाता है, मनुष्य बहुत पीड़ा तथा कष्ट भोगता है और यमदूत जब शिकंजे में लेता है तो मनुष्य अफसोस प्रकट करता है ॥५॥
29मनुष्य “मुझे, मैं, मेरी” पुकारते हुए संसार से चले गए हैं और उनका तन, धन एवं नारियाँ उनके साथ नहीं गई अर्थात् मृत्युकाल के समय कोई भी साथ नहीं देता।
30नामविहीन पदार्थ रसहीन है। धन इत्यादि के मोह में बहका हुआ प्राणी कुमार्ग लग जाता है।
31इसलिए गुरु के आश्रय में आकर परमेश्वर की भक्ति कर और अकथनीय परमात्मा का वर्णन कर ॥६॥
32प्राणी आवागमन के चक्कर में पड़कर जन्म लेता और मरता रहता है और योनियों में पड़ा रहता है।
33वह अपने पूर्व जन्म के कर्मो अनुसार काम करता है। विधाता की लिखी विधि को कैसे मिटाया जा सकता है, जबकि लिखी विधि परमेश्वर की इच्छानुसार लिखी गई हो?
34ईश्वर के नाम के बिना प्राणी की मुक्ति नहीं हो सकती। गुरु उपदेशानुसार ही वह परमात्मा के मिलाप में मिल जाता है।॥७॥
35मेरे प्राणों के स्वामी परमात्मा के अलावा मेरा कोई भी अपना नहीं, मेरी आत्मा व जीवन सब पर उसका अधिकार है।
36हे मेरे अहंकार एवं सांसारिक मोह ! तू जल कर राख हो जा, मेरे लोभ, ममता, अभिमान इत्यादि सब जल जाएँ जो मुझे ईश्वर से दूर करते हैं।
37हे नानक ! नाम की आराधना करने से गुणों के भण्डार (ईश्वर) की प्राप्ति हो जाती है। ॥८ ॥१०॥
38श्रीरागु महला १ ॥
39हे मेरे मन ! ईश्वर से ऐसी मुहब्बत कर, जैसी कमल की जल से है।
40इसको जल की लहरें टपका कर लगातार धकियाती हैं परन्तु फिर भी यह प्रेम के भीतर प्रफुल्लित रहता है।
41प्रभु जल के भीतर ऐसे प्राणी उत्पन्न करता है, जिनकी जल के बिना मृत्यु हो जाती है।॥१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं