गुरु ग्रंथ साहिब 598 · Raag Sorath · Guru Nanak Dev Ji
1बेचारी यह दुनियां तो जन्म मरण के चक्र में ही पड़ी हुई है, चूंकि इसने द्वैतभाव में फंसकर प्रभु-भक्ति को ही भुला दिया है।
2जब सतगुरु मिल जाता है तो ही ज्ञान प्राप्त होता है, किन्तु शाक्त मनुष्य ने भक्ति के बिना अपनी जीवन की बाजी हार दी है।॥३॥
3सतिगुरु ने मेरे बन्धन तोड़कर मुझे मुक्त कर दिया है और अब मैं गर्भ-योनि में नहीं आऊँगा।
4हे नानक ! अब मेरे हदय में ज्ञान-रत्न का प्रकाश हो गया है और निराकार प्रभु ने मेरे मन में निवास कर लिया है।॥४ ॥८ ॥
5सोरठि महला १ ॥
6जिस नामामृत रूपी निधि हेतु तुम इस दुनिया में आए हो, वह नामामृत गुरु के पास है।
7धार्मिक वेष का पाखण्ड एवं चतुराई को छोड़ दो, चूंकि दुविधा में ग्रस्त इन्सान को यह (अमृत) फल प्राप्त नहीं होता॥ १ ॥
8हे मेरे मन ! तू स्थिर रह और इधर-उधर मत भटक।
9बाहर तलाश करने से बहुत दु:ख-कष्ट प्राप्त होते हैं, यह अमृत तो देहि रूपी घर में ही है॥ रहाउ ॥
10अवगुण छोड़कर गुणों की तरफ दौड़ों अर्थात् गुण संग्रह करो, यदि अवगुणों में ही सक्रिय रहे तो बहुत पछताना पड़ेगा।
11तुम भले एवं बुरे के अन्तर को नहीं समझते और बार-बार पापों के कीचड़ में डूबते रहते हो॥ २ ॥
12यदि मन में लोभ की मैल तथा बहुत सारा झूठ है तो बाहर स्नान करने का क्या अभिप्राय है ?
13गुरु के उपदेश द्वारा हमेशा ही निर्मल नाम का जाप करो, तभी तेरे अन्तर्मन का कल्याण होगा ॥ ३ ॥
14लोभ, निन्दा एवं झूठ को निकाल कर त्याग दो, गुरु के वचन द्वारा ही सच्चा फल मिल जाएगा।
15हे हरि ! जैसे तुझे उपयुक्त लगता है, वैसे ही मेरी रक्षा करो, नानक तो शब्द द्वारा तेरी ही स्तुति करता है।॥४॥९॥
16सोरठि महला १ पंचपदे ॥
17अपने लुटते जा रहे घर की तो तुम रक्षा नहीं कर सकते, फिर पराए घर की तरफ बुरी नीयत से क्यों देख रहे हो ?
18अपने घर, द्वार की रक्षा तुम तभी कर सकोगे, यदि तुम प्रभु के नाम-रस को चखोगे, नाम-रस भी वही सेवक चखता है जो गुरुमुख बनकर नाम में लीन हो जाता है॥ १॥
19हे मन ! तू स्वयं को समझा, किस खोटी बुद्धि में लग गए हो ?
20भगवान के नाम को भुलाकर पराए रसों में आकर्षित हो रहे हो। हे भाग्यहीन ! अन्त में तुम बहुत पछताओगे॥ रहाउ ॥
21जब धन आता है तो तू बड़ा खुश होता है लेकिन जब धन चला जाता है तो तू फूट-फूट कर रोने लगता है। यह दु:ख तथा सुख तो साथ ही लगा रहता है।
22भगवान स्वयं ही मनुष्य से दु:ख एवं सुख के भोग करवाता रहता है। लेकिन गुरुमुख व्यक्ति इससे विरक्त रहता है॥ ॥२॥
23हरि-रस से उत्तम कौन-सी वरतु श्रेष्ठ कही जा सकती है, जो इस रस का पान करता है, वह तृप्त हो जाता है।
24जिस व्यक्ति ने माया में मुग्ध होकर यह रस गंवा दिया है, ऐसा शाक्त व्यक्ति दुर्मति में ही लग गया है। ॥३॥
25परमात्मा शरीर के भीतर ही समाया हुआ है। वह मन का जीवन आधार है और शरीर के प्राणों का स्वामी है।
26हे हरि ! यद्यपि तू यह देन प्रदान करे तो ही मैं हरि रस की स्तुति कर सकता हूँ और मेरा मन भी तृप्त हो जाएगा तथा मेरी लगन तुझ में लग ज़ाएगी।॥४॥
27संतों की सभा में ही हरि-रस प्राप्त होता है और गुरु को मिलने से मृत्यु का भय दूर हो जाता है।
28हे नानक ! गुरु के सान्निध्य में राम नाम का जाप करो, जिसके मस्तक पर भाग्य होता है, उसे परमात्मा मिल जाता है॥ ५॥ १० ॥
29सोरठि महला १ ॥
30समस्त जीवों के माथे पर कर्मों के अनुसार विधाता ने नसीब (लेख) लिखा हुआ है और कोई भी नसीब (लेख) के बिना नहीं है।
31परन्तु वह स्वयं लेख से रहित है, अपनी कुदरत की रचना करके वह उसे देखता रहता है और स्वयं ही अपने हुक्म का जीवों से पालन करवाता है।॥१॥
32हे मेरे मन ! राम नाम का जाप करो तो ही तुझे सुख प्राप्त होगा।
33दिन-रात्रि गुरु के चरणों की सेवा करो तो ही तुझे ज्ञान होगा कि परमेश्वर ही दाता है और स्वयं ही भोगने वाला है।॥ रहाउ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं