सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 597 · Raag Sorath · Guru Nanak Dev Ji

1मेरा मन दिन-रात प्रभातकाल तुझ में ही मग्न रहता है। हे मन ! अपनी रसना से हरि का जाप करो ॥ २॥

2हे भगवान ! तुम सत्य हो और हम तुझ में मग्न हैं और तेरे शब्द के भेद को समझकर सत्यवादी बन गए हैं।

3जो लोग रात-दिन भगवान के नाम में मग्न रहते हैं, वे शुद्ध हैं लेकिन जो दुनिया में जन्मते-मरते रहते हैं, वे कच्चे हैं।३॥

4मुझे तो मेरे भगवान जैसा दूसरा कोई दिखाई नहीं देता, फिर मैं किसकी स्तुति करूं ? क्योंकि कोई भी उसका शरीक नहीं।

5नानक विनती करते हैं कि में प्रभु के दासों का दास हूँ और गुरु की मति द्वारा मैंने सत्य को जान लिया है। ४ ॥ ५॥

6सोरठि महला १ ॥

7परमात्मा अलक्ष्य, अपार, अगम्य एवं अगोचर है, वह काल (मृत्यु) एवं प्रारब्ध से रहित है।

8उसकी कोई जाति नहीं, वह समस्त जातियों से दूर है, वह अयोनि एवं स्वयंभू है, उसे न कोई मोह-अभिलाषा है और न ही कोई भ्रम है।१ |

9मैं उस सच्चे सत्यशील परमात्मा पर कुर्बान जाता हूँ,

10न उसका कोई रूप है, न कोई वर्ण है और न ही कोई आकार है, वह तो सच्चे-शब्द के माध्यम से ही मालूम होता है। रहाउ॥

11न ही उसकी कोई माता है, न ही कोई पिता है, न ही कोई पुत्र है और न ही कोई बंधु है, न ही उसमें कोई कामवासना है और न ही उसकी कोई नारी है।

12हे परमात्मा ! तू अकुल, निरंजन एवं अपरम्पार है और तुम्हारी ज्योति सभी के भीतर मौजूद है।॥२॥

13प्रत्येक शरीर में ब्रह्म छिपा हुआ है, सभी के हृदय में उसकी ही ज्योति मौजूद है।

14गुरु के उपदेश से वज कपाट भी खुल जाते हैं और निर्भय प्रभु में सुरति लग जाती है।॥३ ॥

15परमात्मा ने जीवों की रचना करके उनके सिर पर मृत्यु खड़ी कर दी है और समस्त जीवों की जीवन-युक्ति अपने वश में रखी हुई है।

16जो सतगुरु की सेवा करता है, उसे नाम-धन प्राप्त हो जाता है और शब्द की साधना से उसकी मुक्ति हो जाती है।॥४ ॥

17काया रूपी शुद्ध बर्तन में ही सत्य समा सकता है तथा विरले इन्सान ही सदाचारी होते हैं।

18जीवात्मा को परमात्मा ने अपने साथ मिला लिया है, हे परमेश्वर ! नानक तो तुम्हारी ही शरण में आया है| ॥५ ॥ ६॥

19सोरठि महला १ ॥

20जैसे मछली जल के बिना तड़पती मर जाती है, वैसे ही शाक्त इन्सान माया की तृष्णा से प्राण त्याग देता है।

21हे मन ! यदि तेरा श्वास नाम-सिमरन के बिना व्यर्थ ही जाता है तो तुझे वैसे ही प्रभु के बिना मर जाना चाहिए।१ ।

22हे मन ! राम-नाम का यशगान करो।

23लेकिन गुरु के बिना यह रस तुझे किस तरह मिल सकता है? क्योंकि गुरु के मिलने पर ही भगवान यह रस देता है ॥ रहाउ ॥

24संतजनों की सभा में सम्मिलित होना गुरु के सान्निध्य में रहना ही तीर्थ-स्थान होता है।

25गुरु के दर्शन करने से ही अड़सठ तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त हो जाता है।॥२॥

26जैसे ब्रह्मचर्य धारण किए बिना योगी नहीं बना जा सकता तथा सत्य एवं संतोष को धारण किए बिना तपस्या नहीं हो सकती

27वैसे ही भगवान के नाम सिमरन शरीर बेकार है, शरीर के भीतर अनेक दोष होने के कारण यम उसे कठोर दण्ड देता है। ॥३ ॥

28शाक्त मनुष्य को प्रेम प्राप्त नहीं होता और सतगुरु के स्नेह से ही परमात्मा प्राप्त होता है।

29नानक का कथन है कि जिसे सुख एवं दु:ख का दाता गुरु मिल जाता है, वह प्रभु की स्तुति में लीन रहता है।॥४ ॥ ७ ॥

30सोरठि महला १ ॥

31हे प्रभु! तू दाता एवं दानशील है और बुद्धि से परिपूर्ण है, लेकिन हम तो तेरे भिखारी ही हैं।

32मैं तुझ से क्या माँगूं? क्योंकि कुछ भी स्थिर रहने वाला नहीं है अर्थात् प्रत्येक पदार्थ नश्वर है। इसलिए मुझे तो केवल अपना प्यारा हरि-नाम ही दीजिए।॥१ ॥

33प्रभु तो प्रत्येक हृदय में विद्यमान है।

34वह समुद्र, धरती एवं गगन में गुप्त रूप से व्यापक है और गुरु के शब्द द्वारा उसके दर्शन करके कृतार्थ हुआ जा सकता है।॥ रहाउ ॥

35गुरु-सतगुरु ने कृपा करके मृत्युलोक, पाताल लोक एवं आकाश में उसके दर्शन करवा दिए हैं।

36वह अयोनि ब्रह्म वर्तमान में भी है और भविष्य में भी विद्यमान रहेगा। इसलिए अपने हृदय में ही मुरारि प्रभु के दर्शन करो ॥ २॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं