गुरु ग्रंथ साहिब 596 · Raag Sorath · Guru Nanak Dev Ji
1बुराइयों की रोकथाम को अपना उद्यम बना तो ही लोग तुझे धन्य कहेंगे।
2हे नानक ! तब ही प्रभु तुझे कृपा-दृष्टि से देखेगा और तुझ पर चौगुना रूप रंग चढ़ जाएगा। ॥ ४ ॥ २॥
3सोरठि मः १ चउतुके ॥
4माता-पिता को अपना बेटा एवं ससुर को अपना चतुर दामाद बहुत प्रिय है।
5बाल कन्या को अपना पिता बहुत प्यारा है तथा भाई को अपना भाई अच्छा लगता है।
6लेकिन परमात्मा का हुक्म होने पर (मृत्यु का निमंत्रण आने पर) प्राणी ने घर-बाहर हरेक को त्याग दिया और एक क्षण में ही सब कुछ पराया हो गया है।
7मनमुख मनुष्य ने भगवान के नाम का सिमरन नहीं किया, न ही दान-पुण्य किया है, न ही स्नान को महत्व दिया है, जिसके फलस्वरूप उसका शरीर धूल में ही फिरता रहता है अर्थात् नष्ट ही होता रहता है॥ १ ॥
8मेरा मन भगवान के नाम को सहायक बनाकर सुखी हो गया है।
9मैं उस गुरु के चरण छूकर उन पर कुर्बान जाता हूँ, जिसने मुझे सच्ची सूझ-सुमति दी है॥ रहाउ ॥
10मनमुख मनुष्य दुनिया के झूठे प्रेम से बंधा हुआ है और भक्तजनों के साथ वाद-विवाद में क्रियाशील रहता है।
11माया में मग्न हुआ वह दिन-रात्रि केवल माया का मार्ग ही देखता रहता है तथा भगवान का नाम नहीं लेता और माया रूपी विष खाकर प्राण त्याग देता है।
12वह अभद्र बातों में ही मस्त रहता है और हितकारी शब्द की ओर ध्यान नहीं लगाता।
13न ही वह भगवान के रंग में रंगा है, न ही वह नाम के रस से बिंधा गया है। इस तरह मनमुख अपनी इज्जत गंवा देता है। ॥ २ ॥
14साधुओं की सभा में वह सहजावस्था को नहीं चखता और उसकी जिव्हा में कण-मात्र भी मधुरता नहीं।
15वह मन, तन एवं धन को अपना मानकर जानता है लेकिन भगवान के दरबार का उसे कोई ज्ञान नहीं।
16हे भाई! ऐसा मनुष्य अपनी आँखें बन्द करके अज्ञानता के अन्धेरे में चल देता है और उसे अपना घर द्वार दिखाई नहीं देता।
17मृत्यु के द्वार पर उस बंधे हुए मनुष्य को कोई ठिकाना नहीं मिलता और वह अपने किए हुए कर्मो का फल भोगता है।३॥
18यद्यपि भगवान अपनी कृपा-दृष्टि करे तो ही मैं अपनी आँखों से उसके दर्शन कर सकता हूँ, जिसका कथन एवं वर्णन नहीं किया जा सकता।
19अपने कानों से मैं भगवान की महिमा सुन-सुनकर शब्द द्वारा उसकी स्तुति करता हूँ और उसका अमृत नाम मैंने अपने हृदय में बसाया है।
20निर्भीक, निराकार, निर्वेर प्रभु की पूर्ण ज्योति सारे जगत में समाई हुई है।
21हे नानक ! गुरु के बिना मन का भ्रम दूर नहीं होता और सत्य-नाम से ही प्रशंसा प्राप्त होती है।॥४॥३॥
22सोरठि महला १ दुतुके ॥
23हे ईश्वर ! यह जगत रूपी चौबारा तेरा निवास स्थान है। चारों दिशाएँ इस चौबारें की दीवारें हैं, इसका एक पाट धरती है और एक पाट पानी है।
24तेरे मुँह से उच्चरित हुआ शब्द ही एक टकसाल है, जिसमें सब भवनों के जीवों की मूर्तियाँ बनाई गई हैं। १ ।
25हे मेरे मालिक ! तेरी लीलाएँ बड़ी अदभूत हैं।
26तू समुद्र, धरती एवं गगन में भरपूर होकर स्वयं ही सब में समाया हुआ है॥ रहाउ ॥
27जहाँ-जहाँ भी देखता हूँ, वहाँ तुम्हारी ही ज्योति विद्यमान है। तेरा रूप कैसा है?
28तेरा एक ही रूप कितना विलक्ष्ण है और तू गुप्त तौर पर सबमें भ्रमण करता है। तेरी रचना में कोई भी जीव किसी एक जैसा नहीं।२ ।
29अण्डज, जेरज, उद्धृभिज और स्वदेज से पैदा हुए समस्त जीव तूने ही पैदा किए हैं।
30मैंने तेरी एक विचित्र लीला देखी है कि तू सब जीवों में व्यापक है।३॥
31हे भगवान ! तेरे गुण अनन्त हैं परन्तु मैं तो तेरे एक गुण को भी नहीं जानता, मुझ मूर्ख को कुछ सद्बुद्धि दीजिए।
32नानक प्रार्थना करता है कि हे मेरे मालिक ! सुनो, मुझ डूबते हुए पत्थर को बचा लीजिए। ॥४॥४॥
33सोरठि महला १ ॥
34हे मालिक ! मैं बड़ा पापी, पतित एवं परम पाखंडी हूँ, पर तू निर्मल और निराकार है।
35हे ठाकुर जी ! मैं तुम्हारी शरण में हूँ और नामामृत को चख कर मैं परम-रस में मग्न रहता हूँ॥ १ ॥
36हे कर्ता प्रभु! मुझ दीन-तुच्छ का तू ही मान-सम्मान है।
37जिनके दामन में भगवान का नाम रूपी धन है, उनका आदर सत्कार है और वे सच्चे शब्द में लीन रहते है॥ रहाउ ॥
38हे स्वामी ! तू परिपूर्ण है और हम अधूरे तथा अयोग्य हैं। तू गंभीर है और हम बड़े हल्के हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं