सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 592 · Raag Vadhans · Guru Amar Daas Ji

1वह सभी के हृदय में रमण करता है लेकिन फिर भी उनसे निर्लिप्त रहता है। वह अदृष्य है और उसे देखा नहीं जा सकता।

2इस विश्व में पूर्ण गुरु ने उसके दर्शन करा दिए हैं और शब्द के द्वारा उसका ज्ञान प्रदान कर दिया है।

3जो लोग परमपुरुष की आराधना करते हैं और गुरु-शब्द के माध्यम से अपना अहंकार जला देते हैं, वे स्वयं ही पूर्ण पुरुष बन जाते हैं।

4इस विश्व में उस ईश्वर का कोई भी शरीक नहीं है और न ही कोई उसका कटक शत्रु है।

5उसका शासन सदैव अटल है और न वह योनियों में आता है और न ही जाता है अर्थात् वह अनश्वर है।

6उसके भक्त रात-दिन उसकी उपासना करते हैं और सच्चे हरि का गुणगान करते रहते हैं।

7उस सच्चे हरि की कीर्ति को देख कर नानक कृतार्थ हो गया है॥ २॥

8पउड़ी।

9जिनके अन्तर्मन में हमेशा हरि का नाम निवास करता है, हरि का नाम ही उनका रखवाला बन जाता है।

10हरि का नाम ही हमारा पिता है, हरि का नाम ही हमारी माता एवं हरि का नाम ही हमारा सखा एवं मित्र है।

11हरि के नाम से ही हमारी बातचीत है, हरि के नाम से हमारा सलाह-मशविरा है एवं हरि का नाम ही हमारी नित्य देख-रेख करता है।

12हरि का नाम हमारी अत्यंत प्यारी संगति है, हरि का नाम ही हमारा वंश है और हरि का नाम ही हमारा परिवार है।

13नानक को हरि-(रूप) गुरु ने हरि का नाम दिया है और हरि लोक-परलोक में सर्वदा ही हमें मोक्ष दिलवाता है॥ १५ ॥

14श्लोक महला ३॥

15जिनकी सतिगुरु से भेंट हो जाती है, वे सर्वदा हरि का कीर्ति-गान करते रहते हैं।

16उनके मन में अचिंत हरि का नाम निवास कर लेता है और वे सच्चे-शब्द में समा जाते हैं।

17जिसके फलस्वरूप वे अपने वंश का उद्धार कर देते हैं और स्वयं मोक्ष पदवी को प्राप्त कर लेते हैं।

18जो श्रद्धालु गुरु के चरणों में आए हैं, परब्रह्म-परमेश्वर उन पर खुश हो गया है।

19नानक तो हरि का दास है और हरि अपनी कृपा करके उसकी लाज-प्रतिष्ठा बरकरार रखता है॥ १॥

20महला ३॥

21अहंकारवश मनुष्य के भीतर परेशानी ही बनी रहती है और इस असमंजस में वह अपना जीवन दुःखों में बिता देता है।

22अहंकार एक भयानक रोग है, जिसके परिणामस्वरूप वह मरता है, पुनः जन्म लेता है और दुनिया में आता जाता रहता है।

23विधाता ने जिनकी तकदीर में लिखा होता है, उसे सतगुरु -प्रभु मिल जाता है।

24हे नानक ! गुरु की अपार कृपा से उनका उद्धार हो जाता है और शब्द के माध्यम से वे अपने अहंकार को जला देते हैं।॥ २ ॥

25पउड़ी॥

26हरि का नाम हमारा प्रभु है जो अविगत, अगोचर, अनश्वर, परमपुरुष, विधाता है।

27हम हरि के नाम की ही वन्दना करते हैं, हरि के नाम की ही पूजा करते हैं और हमारा मन हरि के नाम में ही मग्न रहता है।

28हरि के नाम जैसा कोई दूसरा नहीं सूझता, क्योंकि हरि का नाम ही अन्त में मोक्ष दिलवाता है।

29जिस परोपकारी गुरु ने हमें हरि का नाम दिया है, उस गुरु के माता-पिता धन्य-धन्य हैं।

30मैं अपने सतिगुरु को हमेशा नमन करता रहता हूँ, जिनके साथ भेंट करने से मुझे हरि के नाम का ज्ञान हुआ है॥ १६॥

31श्लोक महला ३॥

32जिस व्यक्ति ने गुरु के सान्निध्य में रहकर सेवा नहीं की, हरि के नाम से भी प्रेम नहीं लगाया और

33गुरु-शब्द का स्वाद भी नहीं प्राप्त किया, ऐसा अज्ञानी व्यक्ति बार-बार दुनिया में मरता एवं जन्मता रहता है।

34अन्धा मनमुख पुरुष यदि भगवान को कभी याद ही नहीं करता तो उसका इस दुनिया में आने का क्या अभिप्राय है ?

35हे नानक ! भगवान जिस पर अपनी करुणा-दृष्टि करता है, वह गुरु के सान्निध्य में रहकर भवसागर से पार हो जाता है॥१॥

36महला ३॥

37एक सतगुरु ही जाग्रत रहता है, परन्तु बाकी सारी दुनिया मोह एवं तृष्णा में निद्रा-मग्न है।

38जो लोग गुणों के भण्डार सत्य-नाम में मग्न हैं और सतगुरु की सेवा करते हैं, वे मोह-तृष्णा की ओर से जाग्रत रहते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं