गुरु ग्रंथ साहिब 591 · Raag Vadhans · Guru Amar Daas Ji
1जिन गुरु के शिष्यों पर भगवान परम संतुष्ट हैं, उन्होंने सतिगुरु की बात मानी है।
2जो गुरुमुख हरि-नाम का ध्यान-मनन करते हैं, वे उसके प्रेम रंग के चौगुणा रंग से रंगे जाते हैं।॥ १२ ॥
3श्लोक महला ३ ॥
4स्वेच्छाचारी पुरुष बड़ा कायर एवं बदशकल है और भगवान के नाम के बिना वह नकटा है अर्थात् उसका कोई सम्मान नहीं करता।
5ऐसा पुरुष दिन-रात दुनिया के धंधों में व्यस्त रहता है और स्वप्न में भी उसे सुख उपलब्ध नहीं होता।
6हे नानक ! ऐसा पुरुष यदि गुरुमुख बन जाए तो ही उसे मुक्ति मिल सकती है, अन्यथा बन्धनों में फँसा हुआ वह दुख ही भोगता रहता है॥ १॥
7महला ३॥
8गुरुमुख व्यक्ति भगवान के दरबार में सर्वदा सुन्दर लगते हैं और वे गुरु के शब्द का अभ्यास करते हैं।
9उनके अन्तर में सदा शांति एवं सुख बना रहता है और वे सच्चे परमेश्वर के द्वार पर बड़ी शोभा प्राप्त करते हैं।
10हे नानक ! जिन गुरुमुखों ने हरि-नाम पाया है, वे सहज स्वभाव ही सत्य में समा गए हैं॥ २ ॥
11पउड़ी।
12गुरु के सान्निध्य में रहकर भक्त प्रहलाद ने हरि का जाप करके गति प्राप्त की थी।
13गुरु के माध्यम से ही जनक ने हरि के नाम में सुरति लगाई थी।
14गुरु के माध्यम से ही वसिष्ठ जी ने हरि का उपदेश सुनाया था।
15हे मेरे भाई ! गुरु के बिना किसी को भी हरि का नाम प्राप्त नहीं हुआ।
16गुरुमुख व्यक्ति को ही हरि ने स्वयं अपनी भक्ति प्रदान की है॥ १३॥
17श्लोक महला ३॥
18जिस व्यक्ति की सतिगुरु पर श्रद्धा अथवा निष्ठा नहीं बनी और जो शब्द से प्रेम नहीं करता,
19उसे सुख की उपलब्धि नहीं होती, निसंदेह वह सौ बार दुनिया में आता (जन्म लेता) अथवा जाता (मरता) रहे।
20हे नानक! यदि गुरु के सान्निध्य में सच्चे परमेश्वर में सुरति लगाई जाए तो वह सहज स्वभाव ही प्राप्त हो जाता है॥ १॥
21महला ३॥
22हे मन ! ऐसे सतिगुरु की खोज कर लो, जिसकी सेवा करने से जन्म-मरण का दुःख दूर हो जाता है।
23गुरु को पाने से तब तुझे बिल्कुल भी दुविधा नहीं होगी और तेरा अहंकार शब्द के माध्यम से जल जाएगा।
24फिर झूठ की दीवार तेरे अन्तर से निकल जाएगी और तेरे मन में आकर सत्य का निवास हो जाएगा।
25सत्य की युक्ति अनुसार कर्म करने से तेरे अन्तर्मन के भीतर शांति एवं सुख हो जाएगा।
26हे नानक ! पूर्ण तकदीर से सतिगुरु तभी मिलता है, जब परमात्मा अपनी इच्छा से कृपा-दृष्टि करता है॥ २॥
27पउड़ी।
28जिस व्यक्ति के हृदय-घर में न्यायदाता श्रीहरि रहता हो, उसकी मुट्ठी में तो सारी दुनिया ही आ जाती है।
29उस व्यक्ति को किसी की भी अनुसेवा करने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि न्यायदाता श्रीहरि ही सारी दुनिया को लाकर उसके चरणों में झुका कर रख देता है।
30मनुष्यों के न्यायालय में से तो कोई भाग-दोड़कर निकल सकता है किन्तु श्रीहरि के न्यायालय में से कोई किधर जा सकता है ?
31सो ऐसा श्रीहरि न्यायदाता बादशाह भक्तों के हृदय में निवास कर रहा है, जिसने शेष बचे-खुचे समस्त लोगों को भी लाकर भक्तों के समक्ष खड़ा कर दिया है।
32हरि-नाम की कीर्ति तकदीर से ही मिलती है और किसी विरले गुरुमुख ने ही उसका ध्यान किया है॥ १४॥
33श्लोक महला ३॥
34सतिगुरु की सेवा के बिना जगत मुर्दा-लाश के बराबर बना हुआ है और अपना अमूल्य जन्म व्यर्थ ही गंवा रहा है।
35मोह-माया में फँस कर जगत अत्यंत दुःख भोगता है और यह जन्मता एवं मरता रहता है।
36वह विष्टा में निवास करता है और बार-बार योनियों में घूमता रहता हे।
37हे नानक ! भगवान के नाम से विहीन लोगों को यम सख्त सज़ा देता है और अन्तिम क्षणों में लोग पश्चाताप में जलते हुए चले जाते हैं।॥ १॥
38महला ३॥
39इस जगत में एक ही परमपुरुष (भगवान) है, शेष सारी दुनिया तो उसकी स्त्रियाँ हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं