गुरु ग्रंथ साहिब 590 · Raag Vadhans · Guru Amar Daas Ji
1हे नानक ! सतिगुरु की सेवा के बिना जीव दुनिया से मुँह काला करवा कर चला जाता है और यमपुरी में जकड़कर दण्ड भोगता है॥ १॥
2महला १॥
3मैं ऐसी रीति को जला दूँगा, जिसके फलस्वरूप मुझे मेरा प्यारा प्रभु भूल जाता है।
4हे नानक ! वह प्यार ही भला है, जो प्रभु से प्रतिष्ठा कायम रखता है॥ २॥
5पउड़ी।
6एक दाता परमेश्वर की ही भक्ति करनी चाहिए और एक ईश्वर का ही ध्यान करना चाहिए।
7एक दाता परमेश्वर से ही माँगना चाहिए, क्योंकि उससे ही मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं।
8यदि हम भगवान के अलावा किसी दूसरे से मॉगते हैं तो लज्जित होकर मरेंगे।
9जिसने उपासना की है, उसे फल प्राप्त हो गया है और उस व्यक्ति की सारी भूख दूर हो गई है।
10नानक उन लोगों पर न्योछावर है, जो अपने हृदय में रात-दिन हरि-नाम का ध्यान करते हैं॥ १० ॥
11श्लोक महला ३॥
12मेरा प्यारा परमेश्वर भक्तजनों पर स्वयं प्रसन्न हुआ है और अपने भक्तों को उसने स्वयं ही भक्ति में लगा लिया है।
13अपने भक्तजनों का उसने साम्राज्य प्रदान किया है और उनके सिर हेतु उसने सच्चा मुकुट बनाया है।
14वे सर्वदा सुखी एवं निर्मल हैं और सतिगुरु की सेवा करते हैं।
15वे राजा नहीं कहे जा सकते, जो आपस में भिड़कर मर जाते हैं और तत्पश्चात् पुनः योनियों के चक्र में ही पड़े रहते हैं।
16हे नानक ! भगवान के नाम के बिना वे नकटा अर्थात् तिरस्कृत होकर घूमते रहते हैं तथा बिल्कुल ही शोभा प्राप्त नहीं करते॥ १॥
17महला ३॥
18(शब्द को) सुनने एवं निर्देश देने से मनुष्य को इसका स्वाद नहीं आता, जब तक वह गुरुमुख बनकर शब्द में मग्न नहीं होता।
19गुरु की सेवा करने से भगवान का नाम जीव के मन में निवास कर लेता है और भ्रम एवं खौफ उसके भीतर से भाग जाते हैं।
20जीवं जैसा गुरु को जानता है, वह भी वैसे ही हो जाता है और तब उसकी सुरति सत्य-नाम से लग जाती है।
21हे नानक ! नाम के फलस्वरूप ही जीव को कीर्ति प्राप्त होती है और आगे भगवान के दरबार में भी शोभायमान होता है ॥ २ ॥
22पउड़ी॥
23गुरु के शिष्यों के मन में भगवान की प्रीति है और वे आकर गुरु की पूजा करते हैं।
24वे हरि-नाम का बड़े प्रेम से व्यापार करते हैं और हरि-नाम का लाभ अर्जित करके चले जाते हैं।
25गुरु के शिष्यों के मुख हमेशा उज्ज्वल हैं और वे भगवान के दरबार में सत्कृत होते हैं।
26गुरु-सतगुरु भगवान के नाम का अमूल्य भण्डार है और भाग्यशाली गुरु के शिष्य इस गुणों के भण्डार में उनके भागीदार बन जाते हैं।
27मैं गुरु के उन शिष्यों पर न्यौछावर हूँ, जो बैठते-उठते समय सदा हरि-नाम का ध्यान करते रहते हैं।॥ ११॥
28श्लोक महला ३॥
29हे नानक ! भगवान का नाम एक अमूल्य भण्डार है, जिसकी उपलब्धि गुरु के माध्यम से ही होती है।
30स्वेच्छाचारी जीव अपने हृदय रूपी घर में मौजूद इस अनमोल वस्तु को नहीं जानते और ज्ञान से अन्धे भौंकते एवं रोते-चिल्लाते ही जीवन छोड़ देते हैं।॥ १॥
31महला ३॥
32वह काया स्वर्ण की भाँति निर्मल है, जो सत्यस्वरूप परमात्मा के सत्य-नाम में मग्न हो गई है।
33गुरुमुख बनने से इस काया को निर्मल ज्योति वाले निरंजन प्रभु की प्राप्ति हो जाती है और इसका भ्रम एवं डर दूर हो जाते हैं।
34हे नानक ! गुरुमुख व्यक्ति हमेशा सुखी रहते हैं और रात-दिन भगवान के प्रेम में वैरागी बने रहते हैं। २ ॥
35पउड़ी॥
36वे गुरु के शिष्य बड़े धन्य-धन्य हैं, जिन्होंने अपने कानों से ध्यानपूर्वक गुरु का उपदेश सुना है।
37गुरु-सतगुरु ने उनके अन्तर में भगवान के नाम को दृढ़ किया है और उनकी दुविधा एवं अहंकार का नाश कर दिया है।
38भक्तों ने विचार करके यह देख लिया है कि हरि-नाम के सिवाय दूसरा कोई मित्र नहीं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं