गुरु ग्रंथ साहिब 58 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji
1हे भाई ! गुरु के बिना मेरा अन्य कोई भी स्थान नहीं।
2गुरु ने कृपा करके मुझे हरि-नाम की दौलत का खजाना प्रदान किया है, मैं उन पर बलिहारी जाता हूँ ॥१॥ रहाउ॥
3गुरु के उपदेश द्वारा बड़ा यश प्राप्त होता है। ईश्वर करे मेरा उनको साथ मेल-मिलाप हो।
4उसके बिना में क्षण-मात्र भी जीवित नहीं रह सकता। उसके नाम के बिना मैं प्राण त्याग देता हूँ।
5मुझ नेत्रहीन (ज्ञानहीन) को उस पारब्रह्म-प्रभु का नाम कदापि विस्मृत न हो। उसकी शरण में रह कर मैं अपने धाम (परलोक) में पहुँच जाऊँगा ॥२॥
6जिनका गुरु नेत्रहीन (ज्ञानहीन) है, उन शिष्यों को कहीं भी स्थान नहीं मिलता।
7सतिगुरु के बिना परमेश्वर का नाम प्राप्त नहीं होता। नाम के बिना मनुष्य जीवन का क्या मनोरथ है?
8उजाड़ गृह में कौए की भाँति चक्कर लगाने की तरह मनुष्य अपने आवागमन पर दुःख व्यक्त करता है ॥३॥
9नाम के बिना मानव देहि ऐसे संताप झेलती है जैसे शोरा लगी ईटों की दीवार ध्वस्त होती है।
10जब तक सत्य नाम प्राणी के मन में प्रवेश नहीं करता, तब तक सत्य (प्रभु) की संगति इसे प्राप्त नहीं होती।
11नाम के साथ रंग जाने से अपने गृह में ही प्राणी को सदैव स्थिर मोक्ष-पद मिल जाता है ॥४॥
12मैं अपने गुरु से जाकर पूछूगी और उससे पूछकर आचरण करूँगी।
13मैं नाम द्वारा भगवान की महिमा करूंगी चूंकि जो वह मेरे मन में आकर बस जाए और मेरे अहंकार का दुख जल जाए।
14सहज ही मेरा भगवान से मिलन हो जाए और मैं सत्य प्रभु में सदैव के लिए मिली रहूँ॥ ५॥
15वही पवित्र पावन हैं जो काम, क्रोध एवं अहंकार को त्याग कर नाम में मग्न रहते हैं।
16वह सदैव ही नाम की महिमा करते हैं और भगवान को अपने ह्रदय में बसाते हैं।
17अपने चित्त के अंदर हम उसको क्यों भुलाएँ, जो समस्त प्राणियों का आधार है? ॥ ६ ॥
18जो व्यक्ति शब्द द्वारा अपने अहंकार को मार लेता है। वे मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है और पुनः दूसरी बार नहीं मरता।
19गुर-उपदेश से ही ईश्वर के नाम हेतु प्रीति उत्पन्न हो जाती है और परमात्मा मिल जाता है।
20ईश्वर के नाम बिना जगत् यथार्थ से अनजान होकर भटकता फिरता और पुनः पुनः आवागमन में पड़ता है।॥७॥
21हरेक अपने आप की प्रशंसा करता है और अपने आप को महान् जताना चाहता है।
22गुरु के बिना आत्म-पहचान नहीं हो सकती। केवल कहने-सुनने से क्या हो सकता है?
23हे नानक ! यदि मनुष्य प्रभु के सुमिरन द्वारा आत्म-स्वरूप की पहचान कर ले तो वह अपने आप पर अहंकार नहीं करता ॥ ८ ॥ ८ ॥
24श्रीरागु महला १ ॥
25प्राणपति परमेश्वर के बिना भार्या का हार-श्रृंगार एवं सुन्दर यौवन व्यर्थ एवं विनष्ट है।
26वह अपने प्राणपति की सेज का आनंद नहीं भोगती। पति की अनुपस्थिति पर उसका समस्त हार-शृंगार व्यर्थ है।
27भाग्यहीन पत्नी को अत्यंत कष्ट होता है। उसका पति उसकी गृह की सेज पर विश्राम नहीं करता ॥१॥
28हे मेरे मन ! राम नाम जप, तभी सुख मिलेगा।
29गुरु के बिना भगवान से प्रेम नहीं होता। यदि नाम मिल जाए तभी प्यार का रंग चढ़ता है॥१॥ रहाउ॥
30गुरु की सेवा से बड़ा सुख मिलता है और ज्ञान का हार-श्रृंगार करने से पत्नी ईश्वर को अपने पति के तौर पर पा लेती है।
31प्रभु के प्रगाढ़ प्रेम द्वारा पत्नी निश्चित ही अपने प्रीतम की सेज पर आनंद पाती है।
32गुरु की कृपा से पत्नी की अपने प्राणपति प्रभु से पहचान होती है। गुरु के मिलन से वह सुशील नेक आचरण वाली हो जाती है।॥२॥
33हे जीव-स्त्री ! सत्य के द्वारा तू अपने पति से मिलन कर। उससे प्रेम करके तुम अपने प्रियतम पर आकर्षित हो जाओगी। हे जीव-स्त्री ! तेरे पति ने तुझे अपने प्रेम पर आकर्षित किया है, इसलिए उसके प्रेम में लीन हो जा।
34सत्य परमेश्वर के साथ उसका तन-मन प्रफुल्लित हो जाएँगे और उसका मोल नहीं पाया जा सकता।
35जिस जीव-स्त्री के हृदय में उसका पति-परमेश्वर समाया है, वह उसके सत्य नाम के साथ पवित्र हुई है॥३॥
36यदि वह अपने अहंकार को चित्त के भीतर ही कुचल दे तो प्राणपति प्रभु उसे भरपूर सुख सम्मान देता है।
37धागे पिरोए हुए मोतियों की माला जैसे गले से मिलकर सुन्दर बनावट होती है, वैसे ही पति-पत्नी एक-दूसरे से मिल जाते हैं।
38सत्संग के भीतर गुरु द्वारा नाम का आश्रय लेने से सुकून प्राप्त होता है। ४॥
39मनुष्य का मन एक क्षण में यूं हो जाता है, जैसे मृत जीवित हो जाए। वह एक क्षण में मृत समान हो जाता है। यह एक क्षण में कहाँ से आ जाता है और एक क्षण में कहाँ चला जाता है।
40यदि यह नाम को पहचान ले और नाम-सिमरन में लगा रहे फिर इसे मृत्यु दुखी नहीं करती
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं