गुरु ग्रंथ साहिब 589 · Raag Vadhans · Guru Amar Daas Ji
1ऐसे सतगुरु से उन लोगों की ही भेंट होती है, जिनके मुख-मस्तक पर परमात्मा ने भाग्य लिखा होता है॥ ७ ॥
2श्लोक महला ३॥
3मरजीवे ही भगवान की भक्ति करते हैं और गुरु द्वारा भक्ति की जा सकती है।
4भक्ति का भण्डार उन्हें प्रारम्भ से ही दिया हुआ है, जिसे कोई भी मिटा नहीं सकता।
5ऐसे महापुरुष अपने मन में ही गुणों के भण्डार एक परम-सत्य को प्राप्त कर लेते हैं।
6नानक का कथन है कि गुरुमुख व्यक्ति सदैव ही भगवान में मिले रहते हैं और वे फिर कभी जुदा नहीं होते॥ १॥
7महला ३॥
8जो व्यक्ति सतिगुरु की सेवा नहीं करता, वह कैसे चिंतन कर सकता है।
9मूर्ख व्यक्ति विकारों में भटकता रहता है और शब्द के सार को नहीं जानता।
10अज्ञानी एवं अन्धा मनुष्य बहुत सारे कर्म करता है और द्वैतभाव से प्रेम करता है।
11जो व्यक्ति गुणहीन होते हुए भी खुद को बड़ा कहलाते हैं, उन्हें मृत्युदूत मार-मार कर बड़ा तंग करता है।
12नानक का कथन है कि अन्य किस को बताया जाए, जबकि भगवान स्वयं ही क्षमाशील है॥ २॥
13पउड़ी॥
14हे सृष्टिकर्ता ! तू सबकुछ जानता है एवं ये सारे जीव तेरे अपने ही हैं।
15जिसे तू पसन्द करता है, उसे अपने साथ मिला लेता है। लेकिन ये जीव बेचारे क्या कर सकते हैं।
16हे सच्चे सृजनहार ! तू समस्त कार्य करने एवं करवाने में समर्थ है।
17हे प्रियतम ! जिसे तू स्वयं अपने साथ मिलाता है, वही गुरुमुख बनकर तेरा चिन्तन करके तुझ में विलीन हो जाता है।
18मैं अपने सच्चे गुरु पर शत्-शत् कुर्बान हूँ, जिसने मेरे अदृश्य भगवान के दर्शन करा दिए हैं॥ ८॥
19श्लोक महला ३ ॥
20जो रत्नों की परख करने वाला पारखी है, वही रत्नों पर विचार करता है।
21किन्तु अज्ञानी एवं परम अन्धा व्यक्ति रत्नों की कद्र को नहीं जानता।
22कोई मेधावी इन्सान ही यह बात समझता है कि गुरु का शब्द ही रत्न है।
23मूर्ख मनुष्य स्वयं पर बड़ा गर्व करते हैं परन्तु ऐसे मनुष्य जन्म-मरण के चक्र में पड़कर दुखी होते रहते हैं।
24नानक का कथन है कि नाम-रत्नों की प्राप्ति उस व्यक्ति को ही होती है, जिसे गुरुमुख बनकर नाम से प्यार होता है।
25ऐसा व्यक्ति दिन-रात हरि-नाम का ही उच्चारण करता है और हरि का नाम ही उसका प्रतिदिन का व्यवहार बन जाता है।
26यदि परमेश्वर अपनी कृपा करे तो मैं उसे अपने हृदय में बसा कर रख सकता हूँ॥ १॥
27महला ३॥
28जो व्यक्ति गुरु की सेवा नहीं करते एवं हरि के नाम से प्रेम नहीं लगाते,
29उन्हें तुम जीवित मत समझो, क्योंकि उन्हें कर्ता प्रभु ने स्वयं ही समाप्त कर दिया है।
30अहंकार एक बड़ा भयानक रोग है, यह रोग मनुष्य से द्वैतभाव के कर्म करवाता रहता है।
31नानक का कथन है कि मनमुख मनुष्य जीवित रहते हुए भी लाश के बराबर हैं और प्रभु को भुलाकर वे बहुत दु:खी होते हैं॥ २॥
32पउड़ी ॥
33जिसका हृदय भीतर से शुद्ध है, उस व्यक्ति को सभी नमस्कार करते हैं।
34जिस के हृदय में नाम का भण्डार विद्यमान है, उस व्यक्ति पर मैं बलिहारी जाता हूँ।
35जिसके अन्दर विवेक-बुद्धि है तथा मुरारि हरि का नाम विद्यमान रहता है,
36वह सतिगुरु सभी का मित्र है तथा सारी दुनिया से उसका प्रेम है।
37मैंने गुरु की दी हुई बुद्धि से यह विचार किया है कि सब आत्माओं में समाए हुए राम का ही यह प्रसार है॥ ६॥
38श्लोक महला ३॥
39सतिगुरु की सेवा के बिना वह कर्म जीव के लिए बन्धन बन जाते हैं जो कर्म वह अहंकार में ही करता रहता है।
40गुरु की सेवा के बिना जीव को सुख का स्थान नहीं मिलता और वह जन्मता-मरता और दुनिया में आता-जाता ही रहता है।
41सतिगुरु की सेवा के बिना मनुष्य कटु वचन ही बोलता रहता है और उसके मन में भगवान का नाम नहीं बसंता।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं