सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 588 · Raag Vadhans · Guru Amar Daas Ji

1मैं उस गुरु पर हमेशा बलिहारी हूँ, जिसने हरि की उपासना का शुभावसर बनाया है।

2वह प्यारा सतिगुरु हमेशा मेरे साथ है एवं जहाँ-कहीं भी मैं होता हूँ, मुझे मुक्त करवा देता है।

3उस गुरु को शाबाश है, जिसने मुझे हरि का ज्ञान प्रदान किया है ।

4हे नानक ! मैं उस गुरु पर कुर्बान जाता हूँ, जिसने मुझे हरि का नाम देकर मेरे मन की अभिलाषा पूर्ण कर दी है॥५॥

5श्लोक महला ३॥

6तृष्णा में दग्ध होकर सारी दुनिया जल कर मर गई है और जल-जल कर पुकार कर रही है।

7यदि शांति प्रदान करने वाले सतिगुरु से भेंट हो जाए तो उसे फिर से दूसरी बार जलना नहीं पड़ेगा।

8हे नानक ! जब तक मनुष्य गुरु के शब्द पर विचार नहीं करता, तब तक परमात्मा के नाम के बिना कोई भी भय-रहित नहीं हो सकता ॥ १॥

9महला ३॥

10झूठा भेष अर्थात् ढोंग धारण करने से तृष्णा की अग्नि नहीं बुझती और मन में चिन्ता ही बनी रहती है।

11जैसे सर्प की बांबी को ध्वस्त करने से सर्प नहीं मरता वैसे ही निगुरा कर्म करता रहता है।

12दाता सतिगुरु की सेवा करने से मनुष्य के मन में शब्द का निवास हो जाता है।

13इससे मन-तन शीतल एवं शांति हो जाती है और तृष्णा की अग्नि बुझ जाती है।

14जब मनुष्य अपने हृदय से अहंकार को निकाल देता है तो उसे सर्व सुखों का परम सुख मिल जाता है।

15वही गुरुमुख मनुष्य त्यागी होता है जो अपनी वृति सत्य के साथ लगाता है।

16उसे बिल्कुल भी चिंता नहीं होती और हरि के नाम से वह तृप्त एवं संतुष्ट रहता है।

17हे नानक ! भगवान के नाम के बिना मनुष्य का छुटकारा नहीं होता और अहंकार के कारण वह बिल्कुल नष्ट हो जाता है॥ २॥

18पउड़ी॥

19जिन्होंने हरि के नाम का ध्यान किया है, उन लोगों को सर्व सुख प्राप्त हो गया है।

20उन लोगों का समूचा जीवन सफल है, जिनके मन में हरि के नाम की तीव्र लालसा लगी हुई है।

21जिन्होंने गुरु के वचन द्वारा हरि की आराधना की है, उनके सभी दुःख-क्लेश मिट गए हैं।

22वे सन्तजन, गुरु के शिष्य भले हैं, जिन्हें भगवान के अतिरिक्त किसी की भी तनिक चिन्ता नहीं।

23उनका गुरु धन्य-धन्य है, जिनके मुखारबिंद पर हरि के नाम का अमृत-फल लगा हुआ है॥ ६॥

24श्लोक महला ३॥

25इस कलियुग में यमराज प्राणों का शत्रु है लेकिन वह भी ईश्वर की रज़ा अनुसार कार्य करता है।

26जिन लोगों की गुरु ने रक्षा की है, उनका उद्धार हो गया है। लेकिन स्वेच्छाचारी जीवों को वह दण्ड देता है।

27सारी दुनिया यमकाल के वश में कैद है और उसे कोई भी पकड़ नहीं सकता।

28जिस परमेश्वर ने यमराज को पैदा किया है, गुरुमुख बनकर उसकी आराधना करनी चाहिए, फिर कोई दुःख-कष्ट नहीं सताता।

29हे नानक ! जिनके मन में सच्चा परमेश्वर होता है, उन गुरुमुखों की यमराज भी सेवा करता रहता है॥ १॥

30महला ३॥

31यह कोमल काया (अहंकार के) रोग से भरी हुई है और शब्द-ब्रह्मा के बिना इसका अहंकार का रोग एवं दुःख नाश नहीं होता।

32यदि सतिगुरु से भेंट हो जाए तो यह काया निर्मल हो जाती है और हरि के नाम को अपने मन में बसा लेती है।

33हे नानक ! सुख देने वाला परमात्मा के नाम का ध्यान करने से सहज-स्वभाव ही दुःख-क्लेश समाप्त हो जाते हैं।॥ २॥

34पउड़ी॥

35मैं उस गुरु पर हमेशा कुर्बान जाता हूँ, जिसने मुझे जगत के जीवनदाता प्रभु की भक्ति का उपदेश प्रदान किया है।

36मैं उस गुरु पर खण्ड-खण्ड होकर न्यौछावर होता हूँ, जिसने मधुसूदन हरि का नाम सुनाया है।

37मैं उस गुरु पर शत्-शत् कुर्बान जाता हूँ, जिसने अहंकार रूपी विष एवं सभी रोगों को मिटा दिया है।

38उस गुरु का मुझ पर बड़ा उपकार है, जिसने अवगुणों को मिटाकर गुणों के भण्डार परमात्मा का ज्ञान प्रदान किया है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं