गुरु ग्रंथ साहिब 586 · Raag Vadhans
1श्लोक महला ३॥
2यह सारी दुनिया भय में है लेकिन एक पूज्य-परमेश्वर ही निर्भीक है।
3सतिगुरु की सेवा करने से परमेश्वर मन में निवास कर लेता है और फिर मन में भय कदापि प्रवेश नहीं करता।
4कोई दुश्मन एवं दुःख-संकट उसके समीप नहीं आते और कोई उसे तंग नहीं कर सकता।
5गुरुमुख ने अपने मन में यह विचार किया है कि जो परमात्मा को भला लगता है, वही होता है।
6हे नानक ! परमेश्वर स्वयं ही मनुष्य की प्रतिष्ठा रखता है और वही सारे कार्य सम्पूर्ण करता है। ॥१॥
7महला ३॥
8कुछ साथी दुनिया से जा रहे हैं, कुछ मित्र पहले ही दुनिया को छोड़कर चले गए हैं और जो रहते हैं, अंतः वे भी यहाँ से चले जाएँगे।
9जिन्होंने सतगुरु की सेवा नहीं की है, वे दुनिया में आकर अफसोस करते चले गए हैं।
10हे नानक ! जो लोग सत्य में मग्न रहते हैं, वे कदापि जुदा नहीं.होते और सतगुरु की सेवा करके परमात्मा में विलीन हो जाते हैं।॥ २॥
11पउड़ी॥
12जिसके हृदय में गुणकारी भगवान का निवास है, हमें ऐसे महापुरुष सतगुरु से भेंट करनी चाहिए।
13जिसने मन से अहंत्व का नाश कर दिया है, हमें ऐसे प्रियतम सतगुरु से साक्षात्कार करना चाहिए।
14जिसने हरि का उपदेश देकर सारी सृष्टि का कल्याण कर दिया है, वह पूर्ण सतगुरु धन्य-धन्य है।
15हे संतजनो ! नित्य ही राम नाम का जाप करो, जो तुझे विषैले भवसागर से पार कर देगा।
16पूर्ण गुरु ने मुझे हरि का उपदेश दिया है, इसलिए मैं उस गुरुदेव पर सर्वदा कुर्बान जाता हूँ॥ २॥
17श्लोक महला ३॥
18सतगुरु की सेवा-चाकरी सर्व सुखों का सार है।
19गुरु की सेवा करने से दुनिया में बड़ा मान-सम्मान मिलता है और भगवान के दरबार में मोक्षद्वार प्राप्त होता है।
20वह पुरुष सत्य-कर्म ही करता है, सत्य को ही धारण करता है और सत्य-नाम ही उसका आधार है।
21सच्ची संगति से उसे सत्य प्राप्त हो जाता है एवं सच्चे-नाम से उसका प्यार हो जाता है।
22सच्चे शब्द द्वारा वह सर्वदा हर्षित रहता है और सत्य-दरबार में सत्यशील माना जाता है।
23हे नानक ! सतिगुरु की सेवा वही करता है, जिस पर भगवान अपनी कृपा-दृष्टि करता है॥ १॥
24महला ३॥
25उनके जीवन पर धिक्कार है और उनका निवास भी धिक्कार योग्य है, जो सतिगुरु के अतिरिक्त किसी अन्य की सेवा करते हैं।
26वे अमृत को त्याग कर विष से संलग्न होकर विष को कमाते हैं और विष ही उनकी पूंजी है।
27विष ही उनका भोजन है, विष ही उनका पहरावा है और विष के ग्रास ही अपने मुँह में डालते हैं।
28इहलोक में वे घोर कष्ट ही कमाते हैं और मृत्यु के पश्चात् नरक में ही निवास करते हैं।
29स्वेच्छाचारी लोगों के मुँह बड़े मैले हैं, वे शब्द के भेद को नहीं जानते और कामवासना एवं गुस्से में ही उनका विनाश हो जाता है।
30वे सतगुरु का प्रेम त्याग देते हैं और मन के हठ के कारण उनका कोई भी कार्य सम्पूर्ण नहीं होता।
31यमपुरी में वे बांध कर पीटे जाते हैं और कोई भी उनकी प्रार्थना नहीं सुनता।
32हे नानक ! पूर्व जन्म में कर्मो के अनुसार विधाता ने जो तकदीर लिख दी है, हम जीव उसके अनुसार ही कर्म करते हैं तथा गुरु के माध्यम से ही प्रभु-नाम में निवास होता है॥ २॥
33पउड़ी॥
34हे साधुजनो ! उस सतगुरु की सेवा करो, जिसने परमात्मा का नाम मन में दृढ़ करवाया है।
35उस सतगुरु की दिन-रात पूजा करो, जिसने जगन्नाथ-जगदीश्वर का नाम हमें जपाया है।
36ऐसे सतगुरु के क्षण-क्षण दर्शन करो, जिसने हरि का हरि-मार्ग बताया है।
37सभी उस सतगुरु के चरण-स्पर्श करो, जिसने मोह का अन्धेरा नष्ट कर दिया है।
38सभी लोग ऐसे सतगुरु को धन्य-धन्य कहो, जिसने हरि-भक्ति के भण्डार जीवों को दिलवा दिए हैं।॥ ३ ॥
39श्लोक महला ३॥
40सतिगुरु से भेंट हो जाने पर भूख दूर हो जाती है लेकिन पाखण्ड धारण करने से भूख दूर नहीं होती।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं